कोशिका की संरचना (Cell Structure)

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  • कोई भी जीव या तो एककोशिकीय (Unicellular) होता है अर्थात् इसका शरीर केवल एक कोशिका का बना होता है अथवा फिर वह बहुकोशिकीय (Multicellular) होता है अर्थात उसके शरीर में असंख्य कोशिकायें होती हैं. 
  • बहुकोशिकीय जीवों की कोशिकाओं की संख्या उनके आकार पर निर्भर करती है. 
  • The number of cells of multi-cellular organisms depends on their size.
  • कोशिका (Cell) के मुख्य भागों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है —
कोशिका की संरचना (Cell Structure)

कोशिका भित्ति (Cell Wall)-

  • समस्त पादप-कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति कोशिका के चारों ओर निर्जीव पदार्थों की एक परत के रूप में होती है. 
  • कोशिका-भित्ति सेलूलोस (Cellulose) की बनी होती है. 
  • कोशिका-भित्ति जीवद्रव्य द्वारा स्रावित होती है और जीवद्रव्य को निश्चित आकार देने के अतिरिक्त उसकी रक्षा करती है तथा पौधों के शरीर का ढाँचा निर्मित करती है.
  • प्राणि-कोशिका में कोशिका-भित्ति नहीं होती है.

जीवद्रव्य (Protoplasm)-

  • हक्सले (Huxley) ने बताया कि जीवद्रव्य ‘जीवन का भौतिक आधार’ (Physical Basis of Life) है. 
  • सन् 1940 में पुरकिंजे (Purkinje) ने सर्वप्रथम प्रोटोप्लाज्म (Protoplasm) शब्द का प्रयोग किया. 
  • सन् 1861 में मैक्स शुल्ज (Max Shultze) ने जीवद्रव्य वाद (Protoplasm Theory) प्रस्तुत किया. 
  • इस वाद के अनुसार—“सभी जीवधारियों का शरीर जीवद्रव्य से बनी इकाइयों का समूह है तथा सभी पेड़-पौधों व जन्तुओं का शरीर मूल रूप से एक ही समान जीवद्रव्य का बना होता है.” 
  • रासायनिक दृष्टि से जीवद्रव्य कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थों का एक जटिल मिश्रण है. 
  • जीवद्रव्य में जल सबसे अधिक मात्रा में उपस्थित होता है. 
  • जलीय पौधों में 95 प्रतिशत तक जल होता है. 
  • बीज व स्पोर में जल 10-15% होता है. 
  • कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) जीवद्रव्य का आवश्यक भाग है. 
  • कार्बोहाइड्रेट्स सभी जीवों द्वारा ईंधन के रूप में उपयोग में लाये जाते हैं. 
  • ये कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन के यौगिक हैं, जिनमें कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन 1:2:1 के अनुपात में पाये जाते हैं. 
  • प्रोटीन जीवद्रव्य के अत्यधिक जटिल एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्बनिक यौगिक हैं. 
  • जो जीवद्रव्य के भार का लगभग 7.0% होते हैं. 
  • ये कोशिकाओं के विभिन्न अंगक बनाते हैं और केन्द्रक में न्यूक्लियों -प्रोटीन के रूप में पाये जाते हैं. 
  • इन प्रोटीनों को एन्जाइम भी कहते हैं. 
  • प्रोटीन कार्बन (C), हाइड्रोजन (H), नाइट्रोजन (N), तथा ऑक्सीजन (O) के यौगिक हैं जिनमें फास्फोरस (P), सल्फर (S), मैग्नीशियम (Mg) तथा लोहा (Fe) भी विभिन्न संयोग में पाये जाते हैं. 
  • इनके अलावा लिपिड्स (1.5%), राइबोन्यूक्लीक अम्ल (0.4%), डिऑक्सीराइबोन्यूक्लीक अम्ल (0.7%) तथा अकार्बनिक पदार्थ (1.5%) भी जीवद्रव्य में पाये जाते हैं.
  • यद्यपि जीवद्रव्य कार्बनिक तथा अकार्बनिक यौगिकों का मिश्रण है, तथापि इसकी कुछ अपनी विशेषतायें हैं इन विशेषताओं को जीवद्रव्य के जैविक गुण (Biological Properties) कहते हैं. 
  • जीवधारियों में गति या चलन (Movement or Locomotion), पोषण (Nutrition), उपापचय (Metabolism), श्वसन (Respiration), उत्सर्जन (Excretion), सचेतनता या उत्तेजनशीलता (Irritability), वृद्धि (Growth) तथा प्रजनन (Reproduction) आदि जीवद्रव्य के जैविक लक्षणों के कारण ही होता है. 
  • कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) तथा केन्द्रक जीवद्रव्य के दो मुख्य भाग हैं.
कोशिका की संरचना (Diagram of Cell Structure )

कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm)-

  • कोशिकाद्रव्य, जीवद्रव्य का वह भाग है जो केन्द्रक को चारों ओर से घेरे रहता है. 
  • पादप कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य के बाहर चारों ओर एक निर्जीव कोशिका-भित्ति (Cell Wall) होती है. 
  • अतः कोशिकाद्रव्य को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं —

(1) कोशिका कला या जीवद्रव्य कला (Cell Membrane or Plasma Membrane)-

  • समस्त कोशिकाओं के चारों ओर एक पतली, लचीली एवं अर्धपारगम्य (Semipermeable) झिल्ली होती है. 
  • इसे कोशिका कला (Cell Membrane) या जीवद्रव्य कला (Plasma Membrane) कहते हैं. 
  • पादप कोशिकाओं में यह कोशिका-भित्ति के अन्दर की ओर स्थित होती है. 
  • जबकि प्राणि कोशिकाओं में यह बाहरी आवरण बनाती है. 
  • सरल सूक्ष्मदर्शी द्वारा प्लाज्मा झिल्ली को नहीं देखा जा सकता है.

(2) टोनोप्लास्ट (Tonoplast)-

  • टोनोप्लास्ट कोशिका कला की तरह एक कला है. 
  • यह कोशिकाद्रव्य तथा रिक्तिका के बीच होती है.

(3) कोशिका कला तथा टोनोप्लास्ट के बीच का कोशिकाद्रव्य –

  • कोशिका कला तथा टोनोप्लास्ट के बीच कोशिकाद्रव्य का वह भाग जो कोशिका कला के पास होता है और अधिक ठोस रहता है, एक्टोप्लाज्म (Ectoplasm) कहलाता है. 
  • अन्दर की ओर स्थित अधिक तरल एवं दानेदार भाग एण्डोप्लाज्म (Endoplasm) कहलाता है. 

केन्द्रक (Nucleus) 

  • केन्द्रक कोशिका की समस्त जैव क्रियाओं का नियमन करता है. 
  • सभी यूकेरियोटिक कोशिकाओं में सामान्यतः एक केन्द्रक होता है. 
  • कुछ प्रोटोजोअन प्राणिओं (Protozoan animals) तथा शैवाल व कवकों की कुछ जातियों में एक से अधिक केन्द्रक होते हैं . 
  • इस प्रकार की वनस्पति कोशिकाओं को संकोशिकी (Coenocytic) तथा प्राणि-कोशिकाओं को बहुकेन्द्रकी (Syncytial) कहते हैं. 
  • केन्द्रक गोलाकार, अण्डाकार, चपटे आदि विभिन्न आकृति के होते हैं. 
  • कुछ कीटों व लाल रूधिर कणिकाओं में यह अनियमित आकार का होता है. 
  • केन्द्रक का आकार कोशिका के प्रकार एवं केन्द्रक के कार्य पर निर्भर करता है. 
  • शुष्क भार के आधार पर केन्द्रक में प्रोटीन (Protein) 70%, फॉस्फोलिपिड (Phospholipid) 3.5%, DNA (Deoxyribonucleic Acid) 10% तथा RNA (Ribonucleic Acid) 2.3% पाये जाते हैं. 
  • केन्द्रक में निम्नलिखित चार भाग होते हैं

(1) केन्द्रक कला (Nuclear Membrane)-

  • केन्द्रक के चारों ओर एक महीन कला होती है जिसे केन्द्रक कला (Nuclear Membrane) कहते हैं. 
  • केन्द्रक कला दो परतों या झिल्लियों की बनी होती है. 
  • प्रत्येक झिल्ली एक यूनिट मेम्ब्रेन (एकक कला) को प्रदर्शित करती है और 75A मोटी होती है. 
  • दोनों यूनिट मेम्ब्रेन के बीच 150A चौड़ा परिकेन्द्रकीय स्थान (Perinuclear Space) होता है. 
  • केन्द्रक की बाह्य कला एण्डोप्लैज्मिक रेटिकुलम से जुड़ी होती है तथा इसके साथ राइबोसोम भी लगे पाये जाते हैं. 
  • केन्द्रक कला में स्थान-स्थान पर 100-300A व्यास वाले केन्द्रक छिद्र (Nuclear Pores) पाये जाते हैं. 
  • केन्द्रक छिद्र केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य के बीच सम्पर्क बनाये रखते हैं.

(2) केन्द्रकद्रव्य (Nucleoplasm) 

  • केन्द्रक कला के अन्दर केन्द्रक में एक पारदर्शी, अर्ध तरल व कणिकीय मैट्रिक्स होता है जिसे केन्द्रकद्रव्य (Nucleoplasm) या केन्द्रक रस (Nuclear Sap) या कैरियोलिम्फ (Karyolymph) कहते हैं. 
  • इसमें RNA, DNA, प्रोटीन, एंजाइम, लिपिडखनिज लवण आदि पाये जाते हैं.

(3) केन्द्रिक (Nucleolus) 

  • केन्द्रिक की खोज सन् 1781 में फोन्टेना (Fontana) ने की थी. 
  • केन्द्रिक एक छोटी व गोल रचना के रूप में होता है. 
  • कभी-कभी एक केन्द्रक में दो या इससे भी अधिक केन्द्रिकायें होती हैं, जैसे प्याज के केन्द्रक में प्रायः चार केन्द्रिकायें होती हैं. 
  • प्रत्येक केन्द्रिक एक विशेष गुणसूत्र केन्द्रिक संगठन गुणसूत्र (Nuclear Organising Chromosome) के विशिष्ट स्थान पर लगा होता है जिसे केन्द्रिक संगठन क्षेत्र (Nuclear Organising Region) कहते हैं.

(4) क्रोमेटिन (Chromatin) 

  • क्रोमेटिन केन्द्रक का सबसे महत्वपूर्ण भाग है. 
  • यह धागों के रूप में एक-दूसरे के ऊपर फैलकर एक जाल-सा बनता है. 
  • इसे क्रोमेटिन रेटिकुलम (Chromatin Reticulum) कहते हैं. 
  • कोशिका विभाजन (cell division) के समय ये धागे सिकुड़कर छोटे व मोटे हो जाते हैं. 
  • अब इन्हें गुणसूत्र (Chromosomes) कहते हैं. 
  • रासायनिक रूप से क्रोमेटिन न्यूक्लिओप्रोटीन (Nucleoproteins) कुछ एंजाइम व कैल्सियम (Ca) तथा मैग्नीशियम (Mg) के अकार्बनिक यौगिकों से मिलकर बनता है. 
  • न्यूक्लिओप्रोटीन, न्यूक्लीक अम्ल (Nucleic Acid) और क्षारीय प्रोटीन (Basic Protein) के मिलने से बनता हैं. 
  • क्षारीय प्रोटीन मुख्य रूप से हिस्टोन है जो क्षारीय एमीनो अम्ल से बनता है.(Alkaline protein is mainly Histone which is formed from alkaline amino acids.)

धानियाँ या रिक्तिकाएँ (Vacuoles)-

  • धानियाँ, कोशिकाद्रव्य में द्रव से भरे हुए वे स्थान हैं जिनके चारों ओर प्लाज्मा झिल्ली (plasma membrane) के समान झिल्ली (Vacuolar System) होती है. 
  • धानियों में द्रव के रूप में एक प्रकार का तरल पदार्थ भरा रहता है जिसे कोशिका रस (Cell Sap) कहते हैं. 
  • इनमें क्लोराइड, सल्फेट व फॉस्फेट आदि खनिज लवण, इनुलिन, ग्लूकोज व सुक्रोस आदि कार्बोहाइड्रेट, एमीनो अम्ल व कार्बनिक अम्ल घुले रहते हैं. 
  • कभी-कभी कोशिका रस में वर्णक तथा टैनिन व एल्केलॉएड्स (Tannins and alkaloids) के रूप में अवशिष्ट पदार्थ आदि भी घुले रहते हैं. 
  • एन्थोसाएनिन वर्णक की उपस्थिति के कारण फूलों व फलों में विभिन्न रंग उत्पन्न हो जाते हैं . 
  • कोशिका रस कोशिका की स्फीति बनाये रखता है तथा साथ ही साथ यह खाद्य-पदार्थों को संग्रह करने का कार्य भी करता है.

लवक या प्लैस्टिड (Plastids)-

  • लवक मुख्यतः पादप कोशिकाद्रव्य में उपस्थित होते हैं. 
  • ये समस्त पादपों की कोशिकाओं में (नीले हरे शैवाल, बैक्टीरिया व कवकों को छोड़कर) मिलते हैं .
  • लवक कुछ प्रोटोजोआ प्राणियों की कोशिकाओं में भी पाये जाते हैं. 
  • ये कोशिकाओं में बहुत अधिक संख्या में पाये जाते हैं तथा केन्द्रक से छोटे होते हैं. 
  • ये सदैव पूर्ववर्ती लवकों से विकसित होते हैं. 
  • लवक कुछ पौधों में रंगहीन तथा कुछ पौधों में रंगीन होते हैं. 
  • प्रायः विभिन्न प्रकार के लवक एक-दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं, जैसे टमाटर के तरूण अण्डाशय में ल्यूकोप्लास्ट (Leucoplasts) होते हैं. 
  • कच्चे फल में ये हरितलवक (Chloroplasts) तथा फल के पकने पर लाल रंग के क्रोमोप्लास्ट (Chromoplasts) में बदल जाते हैं .
  • लवक (Plastids) कार्य, वर्णक एवं गुणों के आधार पर तीन प्रकार के होते हैं—
  1. अवर्णी लवक (Leucoplasts), 
  2. हरित लवक (Chloroplasts) तथा 
  3. वर्णी लवक (Chromoplasts). 

अवर्णी लवक (Leucoplasts)

  • अवर्णीलवक रंगहीन लवक हैं जिनमें कोई वर्णक नहीं होता. 
  • ये पौधों में जड़ों व भूमिगत तनों में पाये जाते हैं. 
  • इनमें खाद्य पदार्थ संग्रहीत रहते हैं छोटे ल्यूकोप्लास्ट सूर्य के प्रकाश में क्लोरोप्लास्ट में परिवर्तित हो जाते हैं.

हरित लवक (Chloroplasts) 

  • हरित लवक (Chloroplasts) हरे रंग के लवक हैं. 
  • जिनमें हरे रंग का पर्णहरित या क्लोरोफिल (Chlorophyll) उपस्थित होता है, जिसके कारण पौधों के कुछ भाग व पत्तियाँ हरी दिखाई देती हैं . 
  • क्लोरोफिल के द्वारा ही प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) की क्रिया होती है तथा विभिन्न प्रकार के कार्बोहाइड्रेट्स बनते हैं. 
  • उच्च पौधों की पत्तियों की मीसोफिल (Mesophyll) कोशिकाओं तथा तनों के क्लोरन्काइमा (Chlorenchyma) में क्लोरोप्लास्ट पाये जाते हैं. 
  • क्लोरोप्लास्ट एक अर्धपारगम्य व दोहरी बाह्य परिसीमित झिल्ली (Outer Limiting Membrane) द्वारा परिबंधित रहते हैं. 
  • यह झिल्ली प्लाज्मा झिल्ली के समान लिपोप्रोटीन की बनी होती है. 
  • इसके अन्दर प्रोटीन से बना पारदर्शी पदार्थ भरा रहता है जिसे स्ट्रोमा (Stroma) कहते हैं. 
  • स्ट्रोमा को इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देखने पर समांतर झिल्लियों की विस्तृत प्रणाली दिखाई देती हैं. 
  • इन कलाओं को पटलिकाएँ या लैमेली कहते हैं. 
  • प्रत्येक लैमेली दोहरी कला का बना होता है. 
  • स्थान-स्थान पर लैमेली डिस्क के समान स्थूलित होकर एकदूसरे के ऊपर चट्टे के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं और गहरे हरे रंग की बेलनाकार रचनाएँ बनाते हैं. जिन्हें ग्रैना (Grana) कहते हैं. 
  • ग्रैनम में स्थिता लैमेली ग्रैनम लैमेली कहलाते हैं. 
  • ये उपातों पर एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं. 
  • ग्रैना, स्ट्रोमा में फैले लैमेली द्वारा एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं इस लैमेली को स्ट्रोमा लैमेली कहते हैं. 
  • क्लोरोप्लास्ट में प्रकाशऊजा को बंधित करने व ऑक्सीजन के विकास का कार्य ग्रैना में तथा CO2 का अपचयन व कार्बनिक यौगिकों का निर्माण स्ट्रोमा में होता है. 

वर्णीलवक (Chromoplasts) 

  • वर्णीलवक (Chromoplasts) पीले, लाल व नारंगी रंगों के लवक (प्लैस्टिड) हैं. 
  • इन वर्णकों के आपसी मिश्रण से क्रोमोप्लास्ट और भी रंग बनाते हैं.

तारककाय (Centrosomes)-

  • सेन्ट्रोसोम या तारक काय की खोज सन् 1888 में T. Boveri ने की थी. 
  • प्रत्येक सेन्ट्रोसोम दो सेन्ट्रिओल्स (Centrioles) का बना होता है. 
  • इसी कारण इसे डिप्लोसोम (Diplosome) भी कहते हैं. 
  • यह केन्द्रक के निकट पाया जाता है तथा कोशिका-विभाजन से सम्बद्ध होता है. 
  • सेन्ट्रोसोम जन्तुकोशिकाओं तथा शैवाल, कवक, मौस व फर्न आदि पौधों में केन्द्रक के समीप पाया जाता है.

अर्न्तद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum, (ER))-

  • अर्न्तद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) केवल यूकेरिओटिक कोशिकाओं (Eukaryotic Cells) में ही पाया जाता है. 
  • अर्न्तद्रव्यी जालिका कोशिकाद्रव्य में फैली हुई चपटी नलिकाओं या सरणियों का जाल होती है. 
  • इन नलिकाओं की झिल्लियाँ कोशिका-कला के समान यूनिट मेम्ब्रेन (Unit Membrane) की बनी होती हैं. 
  • कहीं-कहीं पर ये नलिकायें प्लाज्मा झिल्ली से लेकर केंद्रक कला तक फैली होती हैं. 
  • कुछ स्थानों पर ये प्लाज्मा झिल्ली के छिद्रों द्वारा कोशिका के बाह्य पर्यावरण से या केन्द्रक कला के छिद्रों द्वारा केन्द्रक से सम्बन्धित होती हैं. 
  • इसके द्वारा घुलित पदार्थों का अभिगमन होता है. 
  • अर्न्तद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) की झिल्लियाँ प्रोटीन व फॉस्फोलिपिड की बनी होती हैं. 
  • इसकी बाह्य सतह पर असंख्य लघु कण होते हैं. 
  • जिन्हें राइबोसोम्स (Ribosomes) कहते हैं. ये प्रोटीन के संश्लेषण केन्द्र हैं.

राइबोसोम्स (Ribosomes)-

  • राइबोसोम्स सूक्ष्म कण हैं जो एण्डोप्लैज्मिक रेटीकुलम की झिल्लियों से लगे हुए अथवा फिर कोशिकाद्रव्य में छितरे हुए मिलते हैं . 
  • ये सूक्ष्म कण, घने तथा गोलाकार कण के रूप में होते हैं. 
  • इन्हें केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है. 
  • राइबोसोम्स के चारों ओर कोई कला नहीं होती. 
  • इनमें केवल RNA पाया जाता है तथा ये कोशिका में प्रोटीन्स का संश्लेषण करते हैं.

माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria)-

  • माइटोकॉन्ड्रिया दोहरी दीवारों वाली खोखली थैलेनुमा या फ्लास्कनुमा रचनायें हैं.
  • इसमें दो झिल्लियाँ व दो कक्ष होते हैं. 
  • माइटोकॉन्ड्रिया की झिल्लियाँ मोटी होती हैं. 
  • बाह्य माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली ER से जुड़ी होती है. 
  • इसकी बाहरी सतह पर राइबोसोम्स भी लगे होते हैं. 
  • भीतरी मोइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली भीतर की ओर अंगुली सदृश उभारों के रूप में निकलकर माइटोकॉन्ड्रिया की गुहा को अविरत कक्षों में बाँटती है. 
  • इन उभारों को क्रिस्टी (Cristae) या माइटोकॉन्ड्रियल क्रैस्ट (Mitochondrial Crest) कहते हैं. 
  • भीतरी झिल्ली तथा क्रैस्ट्स (Crests) पर 80-100A आकार के अनेक कण लगे रहते हैं. 
  • इन कणों को F1 कण (F1 Particles) या ऑक्सीसोम (Oxysomes) कहते हैं. 
  • प्रत्येक माइटोकॉन्ड्रिओन में इनकी संख्या 104-105 तक होती है. 
  • ये कण भीतरी झिल्ली की मोटाई में स्थित होते हैं. 
  • प्रत्येक F1 कण में तीन भाग होते हैं—
  • आधार भाग (Fo), व्रत तथा शीर्ष भाग F1 . 
  • आधार भाग (Fo) में इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर चेन के एन्जाइम होते हैं तथा शीर्ष भाग (F) में AT Pase या ATP सिन्थेटेज एन्जाइम होता है. 
  • यहाँ ADP के फास्फोरिलीकरण से ATP बनते हैं. 
  • माइटोकॉन्ड्रिया जीवाणु और नील-हरित शैवालों को छोड़कर पौधों एवं प्राणियों की सभी सजीव कोशिकाओं में पाये जाते हैं.

गॉल्जी उपकरण तथा डिक्टियोसोम (Golgi Apparatus and Dictyosomes)-

  • गॉल्जीकाय को गॉल्जी पदार्थ, गॉल्जी मेम्ब्रेन, गॉल्जीसोम, गॉल्जी उपकरण आदि नाम दिये गये हैं. 
  • सभी यूकेरिओटिक कोशिकाओं में गॉल्जीकाय पायी जाती है. 
  • किन्तु ब्रायोफाइटा तथा टेरीडोफाइटा के नर युग्मक, परिपक्व चालनी कोशिकायें तथा प्राणियों के लाल रूधिराणु व परिपक्व शुक्राणु इसके अपवाद हैं.
  • निम्न अकशेरूकी प्राणियों तथा पादपों में इसको डिक्टियोसोम (Dictyosome) कहते हैं.
  • प्रोकेरिओटिक कोशिकाओं में गॉल्जी उपकरण नहीं होता.
  • गॉल्जीकाय में झिल्लियों की कई समान्तर तहें होती है.
  • ये चट्टों के रूप में विन्यासित रहती हैं.
  • ये झिल्लियाँ प्लाज्मा मेम्ब्रेन या एंडोप्लैज्मिक रेटिकुलम की मेम्ब्रेन के समान त्रिस्तरीय संरचना (Trilaminar Structure) वाली होती है.
  • ये प्रायः केन्द्रक के सम्मुख स्थित होती हैं.
  • गॉल्जीकाय ध्रुवीकृत रचनायें हैं.
  • इसमें सिस्टर्नी एक निश्चित क्रम में चट्टों में विन्यसित होते हैं.
  • उत्तल सतह की ओर ये छोटे होते हैं. यह सतह अभिरूपण तल (Forming Face) कहलाती है. 
  • स्थानांतरीय वेसीकल्स तथा नलिकायें ER से पृथक होकर नये सिस्टर्नी बनाते हैं.
  • सिस्टनेल चट्टे का दूसरा अवतल तल परिपक्वन तल (Maturing Face) होता है.
  • इसका सम्बन्ध श्रावी वेसीकल्स एवं धानियों के निर्माण से होता है.
  • ये वेसीकल्स परस्पर मिलकर लाइसोसोम या जाइमोजन कणिकायें (Zymogen Granules) बनाते हैं.

लाइसोसोम (Lysosomes)—

  • सभी यूकेरिओटिक कोशिकाओं में लाइसोसोम स्थित होते हैं किन्तु प्राणि-कोशिकाओं में ये अधिक संख्या में मिलते हैं.
  • ये मैक्रोफैग (Macrophages), प्रोकेरिओटिक कोशिकाओं, पौधों की मैरिस्टेमेटिक कोशिकाओं में भी होते हैं. 
  • प्रत्येक लाइसोसोम के चारों ओर लाइपो-प्रोटीन का एक-स्तरीय आवरण होता है. 
  • लाइसोसोम के द्रव में कई प्रकार के अपघटक या हाइड्रोलाइटिक एन्जाइम होते हैं जो वसा, कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन इत्यादि के अपघटन एवं पाचन में भाग लेते हैं.

पक्ष्माभ एवं कशाभ (Cilia and Flagella)-

  • पक्ष्माभ तथा कशाभ धागे के समान रचनायें हैं जो अनेक प्रकार की कोशिकाओं, युग्माणुओं तथा चल बीजाणुओं में पाये जाते हैं.
  • इसका मुख्य कार्य गति, खाद्य-पदार्थों को पकड़ना एवं जल की धाराओं को बनाना है. 
  • प्रत्येक पक्ष्माभ या कशाभ में कुल 11 माइक्रोफाइबर या तन्तुक (Microfibres) होते हैं.
  • इनमें से 9 तन्तुक बाहर की ओर तथा दो तन्तुक मध्य अक्ष पर होते हैं.
  • प्रत्येक तन्तुक दो उपतन्तुकों (Doublets) का बना होता है.
  • प्रत्येक दो उपतन्तुकों में से एक में दो बहिर्वेशन (Projections) होते हैं.
  • दोनों उपतन्तुक (Microfibrils) एक सामान्य भित्ति से घिरे रहते हैं.
  • प्रत्येक मध्य तन्तुक केवल एक नलिका का बना होता है.
  • ऐसे दो एकक तन्तुकों के चारों ओर एक आच्छद (Sheath) होता है.
  • जीवाणुओं के कशाभ में केवल एक तन्तुक होता है.
  • इसमें मुख्य रूप से फ्लैजेलीन (Flagellin) प्रोटीन होता है.

 प्रोकेरियोटिक तथा यूकेरियोटिक (Prokaryotic and Eukaryotic)-

  • प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं का मुख्य लक्षण यह है कि केन्द्रक पदार्थ (Nuclear Material) के चारों ओर केन्द्रक झिल्ली (Nuclear Membrane ) का अभाव होता है तथा माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट, गॉल्जीकाय व लाइसोसोम अनुपस्थित होते हैं.
  • प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं के अन्तर्गत बैक्टीरिया, बैक्टीरियोफेज. वाइरस तथा नीले-हरे शैवाल आते हैं.
  • यूकेरियोटिक कोशिकाएँ, जटिल रचना वाली कोशिकाएँ हैं जिनमें केन्द्रक पदार्थ के चारों ओर सुनिश्चित केन्द्रक झिल्ली होती है
  • तथा कोशिकाद्रव्य में माइटोकॉण्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट, गॉल्जीकाय व लाइसोसोम आदि कोशिकीय अंगक होते हैं.

माइक्रोसोम्स (Microsomes)-

  • माइक्रोसोम्स (Microsomes) कोशिका में एन्डोप्लैज्मिक रेटीकुलम के भाग अथवा खण्ड तथा उन पर लगे हुए राइबोसोम को कहते हैं.
  • इनमें वैसिकल्स (Vesicles), नलिकायें (Tubules) तथा सिस्टरनी (Cisternae) होते हैं.
  • इनके अतिरिक्त माइक्रोसोम्स में गॉल्जीकाय की झिल्लियाँ तथा प्लाज्मा झिल्ली के भाग भी होते हैं .
  • माइक्रोसोम्स कोशिका के कुल भार का 15-20% होता है.
  • इनमें उपस्थित RNA कोशिका के कुल RNA का 50-60% होता है.
  • माइक्रोसोम्स में लिपिड बहुत बड़ी मात्रा में पाये जाते हैं और इनमें बहुत से एन्जाइम्स भी होते हैं.
  • माइक्रोसोम्स में गिल्सेराइड्स (Glycerides), वसा अम्लों, स्टिरॉइड्स (Steroids) आदि का संश्लेषण होता है.

उपापचय के निष्क्रिय पदार्थ (Metabolically Inactive Cell Inclusions)-

  • उपापचय क्रियाओं के कारण कोशिकाओं में संचित, स्रावी व उत्सर्जी तीन प्रकार के निर्जीव पदार्थ उत्पन्न होते हैं. 
  • संचित पदार्थ (Reserve Materials) पौधों का भोजन हैं.
  • पौधे भूमि से जल और खनिज लवण तथा वायुमण्डल से CO2 लेकर स्वयं इनका निर्माण करते हैं.
  • पौधे आवश्यकतानुसार उपापचय के लिए इन पदार्थों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं.
  • जो मुख्य रूप से पौधों के भूमिगत तनों, जड़, कलिकाओं व बीजों में पाये जाते हैं.
  • संचित पदार्थ तीन प्रकार से संचित होते हैं 
  • कार्बोहाइड्रेट, नाइट्रोजनी पदार्थ (प्रोटीन्स) तथा लिपिड व वसा . कार्बोहाइड्रेट कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के यौगिक हैं. 
  • इनमें हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का वही अनुपात (2:1) होता है जो जल में | कुछ कार्बोहाइड्रेट जल में घुलनशील होते हैं और कुछ अघुलनशील  ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ये ऊर्जा उत्पन्न करते हैं.

कुछ कार्बोहाइड्रेट निम्नलिखित हैं-

1. शर्करायें (Sugars)-

  • ये निम्नलिखित प्रकार की होती हैं

(i) मोनोसै के राइड्स (Monosaccharides)—

  • इनका सामान्य सूत्र C6H1206 होता है.
  • ग्लूकोस व फ्रक्टोस पौधों में सामान्य रूप से पायी जाती है.
  • दोनों का रासायनिक सूत्र CH1206 है.
  • ग्लूकोस सामान्य रूप से मीठे फलों में पाया जाता है. 
  • अंगूर में यह 15% तक होती है.

(ii) डाइसैकेराइड्स (Disaccharides)

  •  सुक्रोस गन्ने व कन्दर में पायी जाने वाली सामान्य डाइसैकेराइड शर्करा है.
  •  इसका रासायनिक सूत्र C12H22011 होता है.
  •  गन्ने में 10-15% सुक्रोस होती है.

(iii) ट्राइसैकेराइड्स (Trisaccharides)-

  • रैफीनोस (Raffinose) ट्राइसै केराइड है.

(iv) पोलीसैकेराइड्स (Polysaccharides)—

  • इनुलीन (Inulin) इसका मुख्य उदाहरण है.

2. मण्ड (Starch)

3. ग्लाइकोजन (Glycogen)

4. हेमीसेलूलोस (Hemicellulose)

5. सेलूलोस (Cellulose)

6. पेक्टिन (Pectin)

7. काइटिन (Chitin)

नाइट्रोजनी पदार्थ (Nitrogenous Substances), पौधों में प्रोटीन व एमीनों यौगिकों के रूप में मिलते हैं. 

  • वसा व तेल (Fats and Oils) भी कार्बोहाइड्रेट की भाँति हाइड्रोजन, कार्बन व ऑक्सीजन के यौगिक हैं, किन्तु इनमें ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है.
  • ये कम या अधिक मात्रा में सभी पौधों में पाये जाते हैं.
  • इनका संश्लेषण कोशिकाओं में जीवद्रव्य में होता है.
  • जिसमें ये गोलिकाओं के रूप में छितरे रहते हैं.
  • ये तेल वाले बीजों व फलों, जैसे-कपास, मूंगफली, सरसों, तिल, बादाम, अखरोट, नारियल व जैतून आदि में अत्यधिक मात्रा में मिलते हैं.
  • स्रावी उत्पाद (Secretory Products) कोशिकाओं में जीवद्रव्य द्वारा स्रावित वे पदार्थ हैं जो कोशिकाओं की वृद्धि या पोषण में किसी प्रकार भी काम नहीं आते.
  • फिर भी ये कोशिकाओं की विभिन्न क्रियाओं के लिये अति महत्वपूर्ण हैं .
  • ये निम्न प्रकार के होते हैं-वर्णक (Pigments), एन्जाइम (Enzyme), हारमोन (Hormones), मकरंद (Nectar), विटामिन(Vitamins), लिग्निन, क्यूटिन एवं सुब्रिन तथा पाचक रस . उत्सर्जी पदार्थ पौधों की पत्तियों, फलों, बीजों व छाल में एकत्रित होते रहते हैं.
  • पौधों में पाये जाने वाले उत्सर्जी पदार्थ नाइट्रोजनी अपशिष्ट उत्पाद के रूप में मिलते हैं.
  • जीवों के शरीर में होने वाली उपापचय (Metabolism) क्रिया के फलस्वरूप ऊर्जा प्राप्त होती है तथा नये जीवद्रव्य का निर्माण होता है जिससे जीवधारी आकार में वृद्धि करते हैं और उनके टूटे-फूटे ऊतकों की मरम्मत होती है.
  • इनमें उपापचय (Metabolism) के दो पहलू हैं__

(i) अपचय या कैटाबोलिज्म (Catabolism)-

  • कैटाबोलिज्म के अन्तर्गत खाद्य-पदार्थों के ऑक्सीकरण से उनमें आबद्ध ऊर्जा मुक्त होती है.
  • यही ऊर्जा शरीर की अन्य क्रियाओं के लिये उपयोग में लायी जाती है.
  •  पाचन, श्वसन, पेशीय संकुचन एवं किण्वन (Fermentation) अपचयी क्रियाओं के उदाहरण हैं. 
  • उदाहरणतः ग्लूकोस के एक अणु के ऑक्सीकरण से 38 ATP अणुओं का निर्माण होता है.
  • इसी प्रकार ऐमीनों अम्लों व वसा के ऑक्सीकरण से एसीटाइल सहएंजाइम-A (Acetyl Coenzyme-A) बनता है. 
  • जो क्रैब्स चक्र में पहुंच कर 18 ATP अणुओं को स्वतंत्र करता है.

(ii) उपचय या एनाबोलिज्म (Anabolism)-

  • एनाबोलिज्म के अंतर्गत प्राणियों के शरीर में होने वाली वृद्धि, टूट-फूट की मरम्मत एवं संग्रह के लिए सरल पदार्थों से जटिल यौगिकों का संश्लेषण (जैसे ग्लाइकोजन, प्रोटीन, वसा अम्लों, न्यूक्लीक अम्लों, एंजाइम्स तथा हारमोन्स का संश्लेषण) आदि क्रियाएँ आती हैं.

पादप तथा जन्तु कोशिका में अन्तर (Difference between Plant and Animal Cell)

जन्तु कोशिका (Animal Cell)पादप कोशिका (Plant Cell)
1. जन्तु कोशिका में कोशिका भित्ति नहीं होती.इसके चारों ओर जीवद्रव्य कला एक जीवित झिल्ली होती है. 1.  पादप कोशिका के चारों ओर कोशिका भित्ति होती है, जोकि एक अजीवित पदार्थ कैल्शियम पैक्टेट के सैल्यूलोज से बनती है. 
2. जन्तु कोशिकाओं में तारककाय उपस्थित होता है तथा कोशिका विभाजन में सहायता प्रदान करता है. 2. पादप कोशिकाओं में तारककाय उपस्थिति नहीं होता है.
3. यदि जन्तु कोशिकाओं में धानी उपस्थित होती है, तो वह अत्यधिक छोटी होती है3. पादप कोशिकाओं में व्यापक धानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका रस से भरी होती हैं. 
4. जन्तु कोशिकाओं में ग्लाइकोजन के रूप में संरक्षित भोजन होता4. पादप कोशिकाओं में स्टार्च के रूप में संरक्षित भोजन होता है.
5. जन्तु कोशिकाओं में किसी भी प्रकार के लवक नहीं होते हैं.5. पादप कोशिकाओं में लवक पाया जाता है जो पादपों को विभिन्न रंग प्रदान करता है. 
6. जन्तु कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं होती.6. हरित कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है.

पादप तथा जन्तु कोशिका में समानता (Similarity between plant and animal cell)

  1. जन्तु कोशिका तथा पादप कोशिका दोनों में पतली, अर्द्धपारगम्य तथा जीवित प्लाज्मा झिल्ली पाई जाती है.
  2. जन्तु तथा पादप दोनों कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया उपस्थित होते हैं जो श्वसन के केन्द्र होते हैं.
  3. दोनों कोशिकाओं में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेड तथा विटामिन आदि कार्बनिक पदार्थ तथा खनिज लवण, जल आदि के रूप में अकार्बनिक पदार्थ उपस्थित रहते हैं.
  4. जन्तु तथा पादप दोनों कोशिकाओं में केन्द्रक पाया जाता है, जो सभी जैविक कार्यों को नियंत्रित करता है.
  5. दोनों प्रकार की कोशिकाओं में कोशिका द्रव्य पाया जाता है. 

कोशिका-जीवन की आधारभूत इकाई (The Cell: The Basic Unit of Life)

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