गांधीवादी युग-युद्धोत्तर कालीन स्थिति (Post War Situation)

गांधीवादी युग-युद्धोत्तर कालीन स्थिति (Post War Situation)

गांधीवादी युग का आरम्भ 1919-47 (Beginning of the Gandhian Era)

गांधीवादी युग-युद्धोत्तर कालीन स्थिति (Post War Situation): प्रथम विश्व युद्ध (First world war) (1914-18) के दौरान एक नई स्थिति विकसित हो रही थी. देश में राष्ट्रवाद का तेजी के साथ विकास हो रहा था. राष्ट्रवादियों को युद्ध की समाप्ति के बाद बड़े-बड़े राजनीतिक लाभ मिलने की आशाएं थी.

महायुद्ध (First world war) के बाद के वर्षों में देश की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई. पहले कीमतें बढ़ी और फिर आर्थिक गतिविधियां मंद होने लगी. युद्ध के दौरान विदेशी आयात रुक जाने के कारण भारतीय उद्योगों को विकसित होने का अच्छा अवसर मिला था. परन्तु अब ये उद्योग विभिन्न कारणों से घाटे में चलने लगे और धीरे-धीरे बन्द होने की नौबत आने लगी.

भारत में विदेशी पूंजी बड़ी मात्रा में लगाई जाने लगी. भारतीय उद्योगपति चाहते थे कि सरकार आयातों पर भारी कस्टम ड्यूटी लगाकर तथा अन्य प्रकार की सहायता प्रदान करके उनके उद्योगों को सहायता प्रदान करे. इन उद्योगपतियों को भी महसूस होने लगा कि केवल एक मजबूत राष्ट्रवादी आंदोलन तथा एक स्वाधीन भारतीय सरकार के द्वारा ही ये लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं.

बेरोजगारी, मंहगाई आदि विभिन्न कारणों से समाज के सभी वर्ग यहां तक कि मजदूर तथा दस्तकार भी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हो उठे. प्रथम विश्व युद्ध (First world war) के दौरान देश से बाहर गए भारतीय सैनिकों के दृष्टिकोण में भी अब परिवर्तन आने लगा.

इस समय अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति भी राष्ट्रवाद के पुनरोदय के लिए अनुकूल थी. प्रथम विश्व युद्ध ने सम्पूर्ण एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रवाद को बहुत बल पहुंचाया था. अपने युद्ध-प्रयासों में जन-समर्थन पाने के लिए मित्र राष्ट्रों अर्थात् ब्रिटेन, अमेरीका, फ्रांस, इटली और जापान ने दुनिया के सभी राष्ट्र के लिए जनतंत्र तथा राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का एक नया युग आरम्भ करने का वचन दिया था.

लेकिन युद्ध (First world war) समाप्ति के बाद उन्होंने अपने वायदे पर कोई अमल नहीं किया. उल्टे अफ्रीका,पश्चिमी एशिया तथा पूर्वी एशिया में जर्मनी टर्की के सारे उपनिवेशों को आपस में बांट लिया. इससे एशिया व अफ्रीका में हर जगह जुझारू और भ्रममुक्त राष्ट्रवाद उठ खड़ा होने लगा. यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने भारत में थोड़े से सुधार अवश्य लागू किए, परन्तु उनका सत्ता में भारतीयों को साझेदार बनाने का कोई इरादा नहीं था.

प्रथम विश्वयुद्ध (First world war) के बाद एक महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिली कि गोरों की प्रतिष्ठा में कमी हुई. यूरोपीय शक्तियों ने साम्राज्यवाद के आरम्भ से हो जातीय-सांस्कृतिक श्रेष्ठता का स्वांग रचा था. परन्तु युद्ध (First world war) के दौरान दोनों पक्षों के एक-दूसरे के खिलाफ अंधाधुंध प्रचार से तथा अन्य विरोधात्मक कार्यों से अपने विरोधियों के व्यवहार का वास्तविक स्वरूप उजागर किया. जिससे उपनिवेशों का जनता में गोरों के प्रति विरोधी भावनाओं का विकास हुआ. नवम्बर, 1917 की रूसी क्रान्ति से भी राष्ट्रीय आंदोलनों को बहुत बल मिला. रूस में ब्लादिमीर इल्यिच लेनिन के नेतृत्व में वहां की बोल्शेविक (कम्युनिस्ट) पार्टी ने जार का तख्ता पलट दिया. रूस की क्रांति ने उपनिवेशों की जनता में एक नई जान फेंकी.

राष्ट्रवादी और सरकार विरोधी भावनाओं को उठती लहर से परिचित ब्रिटिश सरकार ने एक बार फिर छूट और दमन की मिली-जुली नीति अपनाने का फैसला किया.

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