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विजयनगर साम्राज्य (The Vijayanagara Empires)संगम राजवंश,सालुव वंश,तुलुव वंश

विजयनगर साम्राज्य (The Vijayanagara Empires)संगम राजवंश,सालुव वंश,तुलुव वंश-सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल (1324-51 ई.) के अन्तिम समय में मुहम्मद बिन तुगलक की गलत नीतियों के कारण सारे साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई तथा अनेक प्रदेशों ने स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी.

विजयनगर साम्राज्य (The Vijayanagara Empires)संगम राजवंश,सालुव वंश,तुलुव वंश

 

1336 ई. में पाँच भाईयों (हरिहर, कम्पा प्रथम, बुक्का प्रथम, मारप्पा तथा मदुप्पा के परिवार के दो सदस्यों हरिहर और बुक्का ने दक्षिण में स्वतन्त्र विजयनगर साम्राज्य की नींव डाली .

यहाँ 1336 ई. से 1565 ई. तक तीन राजवंशों-

  • संगम वंश (1336-1485 ई.),
  • सालुव वंश (1485-1506 ई.) तथा
  • तुलुव वंश (1506-1565 ई.) ने शासन किया.

प्रथम दो राजवंश बहमनी साम्राज्य के समकालीन थे, जबकि तीसरा राजवंश बहमनी साम्राज्य के विघटन से बनी पाँच मुस्लिम रियासतों (बीदर, वरार, बीजापुर, अहमदनगर तथा गोलकुण्डा) का समकालीन था. विजयनगर साम्राज्य के मुख्य वंश निम्न हैं-

संगम राजवंश (1336-1485 ई.) Sangama dynasty

हरिहर प्रथम 1336-56 ई. Harihara I (1336–1356 CE) 

  • हरिहर ‘संगम’ का पुत्र था.
  • उसने अपने भाई बुक्का (प्रथम) के साथ मिलकर तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित अणेगोण्डी के आमने-सामने दो नगर ‘विजय नगर और विद्या नगर’ बसाए.
  • हरिहर ने 18 अप्रैल, 1336 ई. को हिन्दू रीति से अपना राज्याभिषेक किया.
  • उसके द्वारा स्थापित राज्य को आरम्भ में मदुरई और मैसूर के शासकों का सामना करना पड़ा.
  • हरिहर ने बदामी, उदयगिरी एवं गूटी में स्थित दुर्गों को शक्तिशाली बनाया.
  • उसने मदुरा पर विजय पाई तथा होयसल राज्य को भी अपने राज्य में मिलाया. बहमनी राज्य (1346; ई. में स्थापित) से भी उसका संपर्ष हुआ.
  • 1956 ई. में हरिहर की मृत्यु हो गई.

बुक्का प्रथम (Bukka Raya I)

  • हरिहर का उत्तराधिकारी उसका भाई बुक्का प्रथम बना.
  • बुक्का प्रथम (Bukka pratham) ने 1377 ई. तक शासन किया.
  • बुक्का प्रथम ने मदुरा को आपने राज्य में मिलाया.
  • बुक्का प्रथमके शासन काल में विजयनगर और बहमनी राज्यों के मध्य तीन युद्ध (1360, 1365 तथा 1367 ई. में) हुए.
  • बुक्का प्रथम ने ‘वेदमार्ग प्रतिष्ठापक की उपाधि धारण की.
  • बुक्का प्रथमने अपने राज्य की सीमों में और अधिक वृद्धि की.
  • बुक्का प्रथमके साम्राज्य की सीमाओं के अन्तर्गत दक्षिण भारत, रामेश्वरम्, तमिल व चेर प्रदेश भी आ गए थे.

हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.)Harihara II ಹರಿಹರ ೨ (1377–1404 CE)

  • बुक्का प्रथम के उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय ने ‘महाराजाधिराज’ और ‘राजपरमेश्वर’ की उपाधियाँ धारण की .
  • वह एक महान् विजेता था. उसने कनारा, मैसूर, कांची, त्रिचनापल्ली और चिंगलपट आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की.
  • 1300 ई. में बहमनी राजा फिरोजशाह को पराजित होकर सन्धि के फलस्वरूप विजयनगर साम्राज्य को काफी हर्जाना देना पड़ा.
  • 1404 ई. में उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्रों में हुए उत्तराधिकार हेतु संघर्ष में उसका तीसरा पुत्र देवराय प्रथम सफल रहा.
  • किन्तु कुछ ही समय पश्चात् बुक्का द्वितीय (हरिहर द्वितीय का पुत्र) ने गद्दी छीन ली व 1406 ई. तक शासन किया.

देवराय प्रथम (140G-99 ई.) Deva Raya I 

  • 5 नवम्बर, 1406 ई. को देवराय प्रथम राजा बना.
  • देवराय प्रथम बहमनी शासकों से अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा.
  • देवराय प्रथमने तुंगभद्रा नदी पर सिंचाई की सुविधा हेतु नहरें निकलवाई.
  • देवराय प्रथमके शासन काल में इटली का यात्री निकोलो कोटी विजयनगर की यात्रा पर आया.
  • 1492 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
  • देवराय प्रथमके पश्चात् कुछ महीनों के लिए उसके पुत्र क्रमशः रामचन्द्र तथा वीर विजय राय गद्दी पर बैठे.
  • डॉ. के.ए, नीलकण्ड शास्त्री का मत है कि, “मोटे तौर पर माना जा सकता है कि उसका(वीर विजय राय का) शासन काल पाँच वर्षों (1429-26 ई.) का था.
  • संभवतः वह बहमनी शासक अहमदशाह से पराजित हुआ और उसे बहुत बड़ी रकम हर्जाने के रूप में देनी पड़ी.

देवराय द्वितीय (1426-46 ई.) Deva Raya II 

  • देवराय द्वितीयने 1498 ई. में कोदविंद देश पर विजय प्राप्त की तथा केरल पर भी हमला करके इन्हें अपने साम्राज्य में मिलाया.
  • महान् विजेता होने के साथ देवराय द्वितीय एक अच्छा प्रवन्धक और कला तथा साहित्य का संरक्षक भी था.
  • देवराय द्वितीयने अपनी सेना में मुसलमानों को भर्ती किया, अच्छे अरबी घोड़ों का आयात किया व सैनिकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की.
  • जहाँ सेना में सुधार हुआ वहाँ राज्य की अर्थव्यवस्था पर बोझ भी पड़ा.
  • धार्मिक दृष्टि से वह उदार शासक था.
  • उसने कवियों व साहित्यकारों को भी सरंक्षण दिया .
  • तेलगू कवि श्रीनाथ विजयनगर के राजकवि थे.
  • उसके शासन काल में फारस का प्रसिद्ध यात्री अब्दुरज्जाक विजयनगर आया था.
  • 1446 ई. में इस महान शासक की मृत्यु हो गई.

मल्लिकार्जुन या प्रौढ़ देवराय (1446-66 ई.)

  • देवराय के बाद पहले विजयराय द्वितीय नामक व्यक्ति सिंहासन पर बैठा और उसके शीघ्र ही बाद मई, 1447 ई. में उसका अपना पुत्र मल्लिकार्जुन राजा बना.
  • मल्लिकार्जुन के काल में विजयनगर साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया.
  • मल्लिकार्जुन उड़ीसा के गजपतियों और बहमनी सुल्तानों के आक्रमणों को नहीं रोक सका तथा उसे कई अपमानजनक सन्धियों पर हस्ताक्षर करने पड़े.
  • सम्भवतः जुलाई, 1465 ई. में उसकी मृत्यु हुई.
  • सैनिक दृष्टि से चाहे वह अयोग्य व असफल सिद्ध हुआ किन्तु उसने हिन्दू संस्कृति के प्रति अपने वंश के शासकों का प्रेम बनाए रखा.
  • उसने मन्दिरों तथा ब्राह्मणों को अनुदान दिए .

वीरूपाक्ष द्वितीय (1465-85 ई.)

  • वीरूपाक्ष द्वितीय को संगम वंश का अन्तिम शासक कहा जाता है.
  • वह अत्यन्त विलासी शासक था और उसके शासन काल में विजयनगर साम्राज्य में आंतरिक विद्रोह और ब्राह्य आक्रमण दोनों तीव्र हो गए.
  • ऐसी परिस्थितियों में चन्द्रगिरी के गवर्नर (सामन्त) सालुव नरसिंह ने विजयनगर साम्राज्य की रक्षा की.
  • 1485 ई. में वीरूपाक्ष की उसके पुत्र ने हत्या कर दी.
  • परिस्थतियों का लाभ उठाकर सालुव नरसिंह के सेनानायक नरसा नायक ने राजमहल पर कब्जा करके सालुव नरसिंह को सिंहासन पर बैठने हेतु निमन्त्रण दिया.
  • इस घटना को विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में प्रथम बलापहार कहा जाता है.
  • इसी के साथ संगम वंश का अन्त व सालव वंश का सिंहासन पर अधिकार हो गया.

 

सालुव वंश (1486-1505 ई.) Saluva dynasty

सालुव नरसिंह (1486-99 ई.) Saluva Narasimha

  • सालुव नरसिंह ने विजयनगर साम्राज्य को संभावित विनाश से बचाया.
  • सालुव नरसिंह आंतरिक शत्रुओं पर अधिकार कर सका, किन्तु उड़ीसा के पुरुषोत्तम गजपति से पराजित हुआ व बन्दी बनाया गया.
  • फलस्वरूप उसे उदयगिरी का किला और आस-पास के क्षेत्र पुरुषोत्तम को सौंपने पड़े.
  • सालुव नरसिंह ने अरबी घोड़ों का आयात पुनः आरंभ किया.
  • उसे तुलुप्रदेश होनावर बट्टकुल, बाकनुर तथा मंगलोर के बन्दरगाहों को जीतने में सफलता मिली.
  • 1491 ई. में सालुव नरसिंहकी मृत्यु हो गई.
  • उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र इम्माड़ि नरसिंह राजा बना.

इम्माड़ि नरसिंह

  • इम्माड़ि नरसिंह अल्पायु का था अतः सेनापति नरसा नायक ने उसका संरक्षक बनकर सारी शक्ति अपने हाथों में एकत्र कर ली.
  • कालान्तर में उसने इममड़ि नरसिंह को पेनुकोंडा के किले में कैद कर लिया.
  • नरसा नायक ने राचूर दोआव के अनेक किलों पर अपना अधिकार कर लिया तथा चोर, पाण्डुय व चेर राज्यों पर आक्रमण करके इन्हें अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु बाध्य किया.
  • 1503 ई. में रीजेंट नरसा नायक का देहांत हुअ .
  • वीर नरसिंह ने सालुव नरसिंह के अयोग्य पुत्र को पदच्युत करके राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया व तुलुव वंश की स्थापना की.
  • इस घटना को विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में ‘द्वितीय अपहरण‘ कहते हैं.

तुलुव वंश (1505-65 ई.) Tuluva dynasty

वीर नरसिंह 1505-09 ई.

  • तुलुव वंश के संस्थापक वीर नरसिंह का समस्त शासन-काल आन्तरिक विद्रोहों व बाह्य आक्रमणों से प्रभावित था.
  • 1509 ई. में उसकी मृत्यु हो गई तथा उसका चचेरा भाई कृष्णदेव राय राजा बना.

कृष्णदेव राय 1509-30 ई.(विजयनगर साम्राज्य) Krishnadevaraya 

  • इसे (कृष्णदेव राय) तुलुव वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है तथा कृष्णदेव रायकी गणना विजयनगर साम्राज्य के सर्वश्रेष्ठ राजाओं में की जाती है.
  • 1513 ई. में उसने उड़ीसा के राजा गजपति प्रतापरुद्र को पराजित किया व 1514 ई. में उदयगिरी के किले पर अधिकार किया.
  • फिर उसने कोडविन्दु और कोडपल्ली पर अधिकार किया तथा 1520 ई. में बीजापुर को जीता और गोलकुण्डा के दुर्ग को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया.
  • इस प्रकार विजयनगर का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण दक्षिण के राज्यों में सर्वोच्च हो गया.
  • कृष्णदेव राय ने पुर्तगाली शासक अलबुकर्क के अनुरोध पर उसे भट्टकल में दुर्ग के निर्माण की आज्ञा दे दी.
  • पुर्तगाली यात्री डोमिंगोस पाइस (Domingos Paes) ने उसके व्यक्तित्व की भूरि-भूरि प्रशंसा की है.
  • 1529 ई. में कृष्णदेव राय की मृत्यु हो गई.
  • कृष्णदेव राय एक महान योद्धा व कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक तथा कला का संरक्षक भी था.
  • कृष्णदेव राय एक महान् विद्वान और कवि भी था.
  • कृष्णदेव राय ने तेलुगू में ‘आमुक्तमाल्यद’ नामक कविता लिखी.
  • अल्लसानी पेडना उसका राजकवि था.
  • कृष्णदेव राय ने गौपुर टावर का निर्माण करवाया.
  • कृष्णदेव राय ने नागलापुर नामक नगर बसाया तथा सिंचाई और पानी की व्यवस्था के लिए अनेक तालाब बनवाए.
  • कृष्णदेव राय के प्रसिद्ध दरवारी तेनालीराम कृष्ण ने “पाँडुरंग महात्म्य‘ की रचना की.
  • ‘पॉडुरंग महात्म्य’ की गणना पाँच महाकाव्यों में की जाती है.
  • कृष्णदेव राय की मृत्यु के पश्चात् विजयनगर साम्राज्य का विघटन आरम्भ हो गया.

अच्युतदेव राय 1529-42 ई.

  • कृष्णदेव राय के पश्चात् उसका भाई अच्युतदेव राय राजा बना.
  • अच्युतदेव राय अत्यन्त दुर्बल व अयोग्य शासक था.
  • फलस्वरूप केन्द्रीय सत्ता कमजोर हो गई और अनेक प्रतिद्वंद्वी दल अस्तित्व में आ गए.
  • 1542 ई. में अच्युतदेव राय की मृत्यु हो गयी तथा उसका नाबालिक पुत्र वेंकेट प्रथम राजा बना तथा उसका मामा तिरूमल उसका संरक्षक बना.
  • थोड़े ही समय में अच्युतदेव के भतीजे सदाशिव, बीजापुर के शासक आदिलशाह और तिरूमल की सांठ-गाँठ के परिणामस्वरूप सदाशिव को विजयनगर का सिंहासन प्राप्त हुआ.

सदाशिव राय 1549-67 ई.

  • सदाशिव राय के शासन काल में शासन की वास्तविक सत्ता रामराय के हाथों में रही.
  • सदाशिव रायने अपनी कूटनीति तथा शक्ति द्वारा अहमदनगर तथा बीजापुर में फूट उत्पन्न कर दी और 1552 ई. का रायचूर और मुद्गल दोनों पर अधिकार कर लिया.
  • 1560 ई. तक विजयनगर दक्षिण की सर्वोच्च शक्ति बन गया.
  • 1543 ई. में राम राय ने बीजापुर के विरुद्ध अहमदनगर और गोलकुण्डा से सन्धि की कालान्तर में उसने अहमदनगर के विरुद्ध बीजापुर तथा गोलकुण्ड एवं बीजापुर को सहयोग दिया, किन्तु उसकी यह नीति असफल रहीं.

तालीकोट का युद्ध

  • बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा तथा बीदर के संयुक्त मोर्चे ने 25 जनवरी 1565 ई. को विजयनगर पर आक्रमण कर दिया.
  • तालीकोट युद्ध को ‘तालीकोटा का युद्ध’, ‘राक्षसी तंगड़ी का युद्ध‘ अथवा ‘बन्नहट्टी का युद्ध‘ के नाम से भी जाना जाता है.
  • तालीकोट युद्ध में संयुक्त मार्च को विजय प्राप्त हुई तथा इसी पराजय के साथ विजयनगर साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया तथा दक्षिण में हिन्दू सर्वोच्चता का अन्त हो गया.
  • युद्ध के परिणामों के प्रतिकूल होने पर भी विजयनगर साम्राज्य लगभग सौ वर्ष तक अस्तित्व में रहा.
  • तिरूमल के सहयोग से सदाशिव ने पेनुकोंडा को राजधानी बनाकर शासन करना शुरू कर दिया तथा 1570 ई. के लगभग यहीं पर तिरूमल ने सदाशिव को अपदस्थ करके आरविडु वंश की स्थापना की.

आरवीडु वंश अथवा अराविदु वंश के प्रमुख शासक थे-

  • तिरूमल राय (1568-72 ई.),
  • श्री रंगा द्वितीय (1614-17 ई.),
  • रामदेव राय (1630-42 ई.) और
  • श्री रंग तृतीय (1642-49 ई.).

1649 ई. में इस राज्य को बीजापुर के सामने आत्म समर्पण करना पड़ा. 1672 ई. में श्री रंगा तृतीय की मैसूर में मृत्यु हो गई. इसी के साथ विजयनगर साम्राज्य का अन्त हो गया.

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