आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघो का विकास (Growth of Modern Political Ideas and Political Association)

आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघो का विकास (Growth of Modern Political Ideas and Political Association)

आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघों का विकास (Growth of Modern Political Ideas and Political Association)-भारत में पाश्चात्य संस्कृति व विचारों की उपस्थिति ने अनेक ऐसी शक्तियों के जन्म में सहायता प्रदान की जो बाद में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए गंभीर चुनौतियों का कारण बन गई थी. पाश्चात्य संस्कृति की उपस्थिति के फलस्वरूप ही भारत में राष्ट्रवाद राष्ट्रीयता तथा राजनीतिक अधिकारों जैसी धारणाएं विकसित हो सकी. आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघों के विकास के फलस्वरूप ही भारतीय इतिहास को अपना गौरव प्राप्त हो सका तथा भारत आधुनिकता की ओर बढ़ने में सफल हुआ. इन राजनीतिक संघों के विकास से ही लोगों में एकता तथा एकजुटता देखने को मिली. 1885 से पूर्व अर्थात् राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन निम्नलिखित थे, जिन्होंने राष्ट्रवादी विचारों के विकास की दिशा में प्रयास किए थे.

 

बंगाल में राजनीतिक संगठन (Political Association in Bengal)

 

राजाराम मोहन राय प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने आधुनिक भारत में समाज सुधारक कार्यों व राजनीतिक आंदोलन का शुभारम्भ किया तथा भारतीयों की शिकायतों की ओर अंग्रेजों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयत्न किया और समाधान मांगा. वह बहुत बड़े विद्वान थे. राजाराम जी पाश्चात्य विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे. सार्वभौमिकता से ओत-प्रोत राजाराम मोहन राय ने समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता, सिविल न्यायालयों में भारतीयों की नियुक्ति तथा उच्च पदों आदि के लिए मांग की. परिणामस्वरूप 1833 के चार्टर में कुछ उदारवादी धाराएं देखने को मिली.

 

(i) बंगभाषा प्रकाशन सभा(Bangabhasha Prakashan Sabha)

 

राजाराम मोहन राय के अनेक साथियों ने सर्वप्रथम 1836 में ‘बंगभाषा प्रकाशन सभा’ नामक राजनीतिक संस्था की स्थापना की. इस सभा का उद्देश्य सरकारी क्रिया-कलापों की समीक्षा कर उनके सुधार के लिए प्रार्थना पत्र भेजना था.

 

(ii) जमीदारी एसोसिएशन (Zamindari Association)

 

जमींदारी एसोसिएशन की स्थापना 1838 में हुई थी. इसे भूमिपतियों की सभा (Landholders Society) के नाम से भी जाना जाता था. यह पहली सभा थी जिसने संगठित राजनीतिक प्रयासों का शुभारम्भ किया तथा शिकायतों को दूर करने के लिए संवैधानिक उपचारों का प्रयोग किया. कलकत्ता के भूमिपतियों की यह सभा श्री एडम्ज द्वारा स्थापित इंग्लैण्ड की ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (British India Society) से भी सहयोग करती थी.

 

(iii) बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (Bengal-British India Society )

 

1843 में बंगाल-ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी नामक एक अन्य राजनीतिक सभा स्थापित की गई. इस सभा का प्रमुख उद्देश्य अंग्रेजी शासन में भारतीयों की वास्तविक अवस्था के विषय में जानकारी प्राप्त कर उनका प्रचार-प्रसार करना तथा जनता की उन्नति के लिए व न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए शान्तिमय और कानूनी साधनों का प्रयोग करना था.

 

(iv) ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन (British-Indian Association)

उपरोक्त में से दो सभाओं अर्थात् भूमिपतियों की सभा और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी की असफलताओं के कारण इन दोनों को 28 अक्टूबर, 1851 को मिलाकर एक ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन नामक संगठन बनाया गया. यह सभा भूमिपतियों के हितों के लिए मुख्य रूप से काम कर रही थी तथा इसी के प्रयासों से 1853 में चार्टर के नवीकरण के समय ब्रिटिश संसद को एक प्रार्थनापत्र भेजा गया. इस प्रार्थना पत्र में एक लोकप्रिय विधान सभा की, न्यायिक और दण्डनायक कार्य अलग कर दिए जाने की, अधिकारियों के वेतन कम किए जाने की तथा नमक, आबकारी और स्टाम्प कर को समाप्त करने की मांग की गई. इसके प्रभावस्वरूप 1853 के चार्टर एक्ट में छ: और सदस्य गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी में कानून बनाने के लिए जोड़ दिए गए. एक राजनीतिक संस्था के रूप में यह 20वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में रही, तदोपरान्त भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे आच्छादित कर लिया.

 

(v) इण्डियन लीग (Indian League)

 

1870 तक भारतीय समाज में काफी बदलाव आ चुके थे. प्रेजिडेन्सी नगरों में उच्च शिक्षा के प्रसार के कारण पढ़े-लिखे लोगों का एक नया वर्ग अस्तित्व में आ गया था. इसी क्रम में सितम्बर, 1875 में बाबू शिशिर कुमार घोष ने ‘इण्डियन लीग‘ स्थापित की. इसका प्रमुख उद्देश्य लोगों में राष्ट्रवाद की भावना का विकास कर राजनीतिक शिक्षा को प्रोत्साहित करना था.

 

(vi) इण्डियन एसोसिएशन (Indian Association)

 

इण्डियन लीग की स्थापना के एक वर्ष के भीतर ही 26 जुलाई, 1976 को इसका स्थान इंडियन एसोसिएशन ने ले लिया, जिसे आनन्द मोहन बोस और सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी ने स्थापित किया था. इस संगठन का उद्देश्य मध्यम वर्ग के साथ-साथ साधारण वर्ग को भी इसमें सम्मिलित करना था. जिसके लिए इसमें चन्दे की दर, ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन के 30 रुपये वार्षिक के विपरीत मात्र 5 रुपये वार्षिक रखा गया. बहुत जल्दी ही यह संगठन शिक्षित वर्ग का केन्द्र बिन्दु बन गया.

भारत में लिटन की गलत नीतियों के कारण राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगी. आई. सी. एस. की परीक्षा के लिए प्रवेश की आयु 21 से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई. चूंकि यह परीक्षा लन्दन में होती थी इसलिए कम आयु के युवकों के लिए वहां जाकर परीक्षा देना मुश्किल हो गया था. अतः इण्डियन एसोसिएशन ने इसके विरुद्ध आंदोलन प्रारम्भ कर दिया जिसे ‘भारतीय जनपद सेवा आंदोलन’ (Indian Civil Service Agitation) कहते हैं.

 

बम्बई में राजनीतिक संगठन (Political Associations in Bombay)

 

(i) बम्बई एसोसिएशन (Bombay Association)

 

26 अगस्त, 1852 को बम्बई में कलकत्ता की ब्रिटिश इण्डिया एसोसिएशन के नमूने पर ‘बम्बई एसोसिएशन‘ बनाई गई. इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य सरकार को समय-समय पर ज्ञापन देना था, ताकि हानिकारक समझे जाने वाले नियमों तथा सरकारी नीतियों के लिए सुझाव दिए जा सकें.

 

(ii) बम्बई प्रेजिडेन्सी एसोसिएशन (Bombay Presidency Association)

 

लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों तथा इल्बर्ट बिल पर हुए विवाद का बम्बई के राजनीतिक क्षेत्रों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा, परिणामस्वरूप 1885 में बम्बई प्रेजिडेन्सी एसोसिएशन (Bombay Presidency Association) की स्थापना की गई. इस संगठन की स्थापना का श्रेय बम्बई के तीन प्रमुख सम्प्रदायों से जुड़े हुए व्यक्तियों मेहता, तेलांग और जयबजी को जाता है.

 

(iii) पूना सार्वजनिक सभा (Poona Sarvajanik Sabha)

 

इस सभा की स्थापना 1970 में न्यायमूर्ति व उनके सहयोगियों द्वारा पूना में की थी. इसका प्रमुख उद्देश्य सरकार और जनता के बीच सेतु के रूप में कार्य करना था. बम्बई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन और पूना सार्वजनिक सभा घनिष्ठ तालमेल के साथ कार्य करती थी.

 

मद्रास में राजनीतिक संस्थाएं (Political Associations in Madras)

 

(i) मद्रास नेटिव एसोसिएशन (Madras Native Association)

 

मद्रास नेटिव (स्थानीय) एसोसिएशन की स्थापना कलकत्ता की ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन की शाखा के रूप में की गई थी. 1853 के चार्टर में सुधारों के लिए इसने भी ब्रिटिश संसद को बम्बई तथा कलकत्ता एसोसिएशन के नमूने पर ही एक ज्ञापन भेजा. परन्तु इस संगठन का विशेष महत्व नहीं है क्योंकि 1857 में यह लुप्त हो गया था.

 

(ii) मद्रास महाजन सभा (Madras Mahajan Sabha)

 

मई, 1884 मे विरारघवाचारी(Viraraghavachari),जी. सब्रह्मण्यम अय्यर,आनन्दा चालू आदि लोगों ने मद्रास महाजन सभा की स्थापना की. इसके 29 दिसम्बर, 1884 से 2 जनवरी, 1885 तक चले अधिवेशन में इस सभा ने निम्नलिखित मांगे रखी- विधान परिषदों का विस्तार किया जाए तथा इनमें भारतीयों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए. न्यायपालिका व राजस्व एकत्रित करने वाली संस्थाओं का पृथक्करण किया जाए.

 

इसी क्रम में आगे अखिल भारतीय स्तर पर एक संयुक्त राजनीतिक संस्था की आवश्यकता महसूस होने लगी थी. 1866 में लन्दन में दादा भाई नौरोजी ने ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन (East India Association) का गठन किया. जिसका उद्देश्य तत्कालीन भारतीय समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर ब्रिटिश शासन को प्रभावित करना था. 1877 की पूना सार्वजनिक सभा (Poona Sarvajnik Sabha) ने बम्बई और कलकत्ता के प्रतिनिधियों से मिल जुल कर कार्य करने की प्रेरणा दी.

1878 में लाइसेंस कर (Licence Tax) लगाने और 1879 में कपास के कपड़े पर आयात कर (Cotton Duties) हटाने के विरोध में संपूर्ण भारत में स्थान-स्थान पर विरोध प्रकट करने के लिए सभाएँ आयोजित की गई. इस प्रकार विभिन्न कारणों से स्थानीय संगठनों के नेता सम्मिलित व एकरत कार्यक्रम चलाने के लिए उद्यत हो गये. 1882 में राष्ट्रीय स्तर पर सभा बुलाने, आपस में समन्वय स्थापित करने तथा अखिल भारतीय स्तर पर अनेक कार्यक्रम शुरू करने की बात चल रही थी.

 

1 मार्च, 1883 को ह्युम(Allan Octavian Hume) ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सबसे मिल-जुलकर स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने की अपील की जिसका शिक्षित भारतीयों पर अच्छा प्रभाव देखा गया. इस ओर पहला कदम सितम्बर, 1884 में उठाया गया, जब ‘आड्यार’ (मद्रास) में थियोसोफिकल सोसायटी का वार्षिक अधिवेशन हुआ और इसमें ह्यूम(Allan Octavian Hume), दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी आदि गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया. 1884 में ‘इंडियन नेशनल यूनियन’ नामक राष्ट्रीय स्तर के संगठन की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य देश की सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर उचित कार्यवाही करना था.

इसी समय ह्यूम ने तत्कालीन वायसराय लार्ड डफरिन से विचार विमर्श किया. ऐसा माना जाता है कि ‘इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना का निर्णय ह्यूम ने डफरिन की सलाह पर ही लिया था. डफरिन भी चाहता था कि भारतीय राजनीतिज्ञ वर्ष में एक बार एकत्रित हों. जहां पर वे प्रशासनिक कार्यों के प्रति अपनी वास्तविक भावनाएं प्रकट करें ताकि प्रशासन भविष्य की घटनाओं के प्रति सतर्क रह सके.

ह्यूम इस संगठन की स्थापना से पूर्व इंग्लॅण्ड गये जहां उन्होंने डलहौजी, जान बाइट, रिपन एवं स्लेग आदि राजनीतिज्ञों से इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया. भारत लौटने से पहले ह्यूम ने इंग्लेण्ड में भारतीय समस्याओं के प्रति ब्रिटिश संसद के सदस्यों में रुचि पैदा करने के उद्देश्य से ‘भारत संसदीय समिति’ (Indian Parliamentary Committee) की स्थापना की. भारत पहुँचने के बाद ह्यूम ने ‘इंडियन नेशलन यूनियन’ (Indian National Union) की 25 दिसम्बर, 1885 को बम्बई में बैठक बुलाई जहां पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद इंडियन नेशलन यूनियन का नाम बदल कर ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ (Indian National Congress) या ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस‘ रखा गया. इस प्रकार 28 दिसम्बर, 1885 को ए. ओ. ह्यूम (Allan Octavian Hume) के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई.

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *