मुगल कालीन आर्थिक अवस्था (Financial status of Mughal era) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

मुगल कालीन आर्थिक अवस्था

  • इस काल की आर्थिक स्थिति की एक महत्वपूर्ण विशेषता शासक वर्ग एवं जन-साधारण के जीवन में पाई जाने वाली घोर आर्थिक विषमता थी.
  • लोग बिना सरकारी हस्तक्षेप के किसी भी व्यवसाय को चुन सकते थे.
  • मुख्य व्यवसाय कृषि था तथा गाँव प्रायः आत्म-निर्भर थे.
मुगल कालीन आर्थिक अवस्था (Financial status of Mughal era) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

कृषि

  • लोग प्रायः गेहूँ, चावल, जौ, मटर, चना, तिल, तिलहन, ज्वार, बाजरा, कपास, गन्ना, दालें, फल, सब्जियाँ, तम्बाकू, पोस्त, चाय, कॉफी, जूट, चन्दन आदि की कृषि करते थे.
  • बाबर ने आगरा के आस-पास के क्षेत्रों में सिंचाई का वर्णन किया है.
  • अकबर ने कृषि की उन्नति हेतु विशेष ध्यान दिया.
  • प्राकृतिक विपत्तियों के समय कई बार किसानों की कठिनाइयां बढ़ जाती थीं, किन्तु ऐसी परिस्थिति में सरकार प्रायः सहायता तथा राहत कार्य करती थी.

मुगल कालीन उद्योग

  • कई बार गाँवों में कुटीर उद्योग स्थापित किए जाते थे तथा इनके श्रमिक प्रायः वंशानुगत रहते थे.
  • इस काल में कृषि पैदावार पर आधारित सबसे महत्वपूर्ण उत्पादन गुड़, इत्र तथा रावाब थे.
  • मुगल काल में शहरों के प्रमुख उद्योग धन्धे थे-वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग, पत्थर तथा ईंटों के उद्योग, चीनी का उद्योग, चमड़े का उद्योग, हाथी दाँत, मूँगे और नकली जवाहरात बनाने के उद्योग आदि.
  • दिल्ली, आगरा, श्रीनगर, लाहौर, कैम्बे, अहमदाबाद, ढाका, खम्बात, मुल्तान, बरार, बरहानपुर आदि नगर विभिन्न उद्योग के लिए प्रसिद्ध थे.
  • बिहार, बंगाल, आगरा, बनारस, जौनपुर, पटना, मालवा इत्यादि सूती वस्त्र के प्रमुख केन्द्र थे.
  • बंगाल सूती तथा रेशमी वस्त्र उद्योग का प्रमुख केन्द्र था.
  • बढ़िया किस्म की रेशम चीन से मंगाई जाती थी.
  • जहाँगीर ने ऊनी वस्त्र उद्योग अमृतसर में स्थापित किया था.
  • देश के कई स्थानों पर सुन्दर चादरें, फूलदार कालीन, साड़ियाँ, शालें आदि भी बनाई जाती थीं.
  • अंग्रेजों के सत्ता सम्भालने तक वस्त्र उद्योग निरन्तर प्रगति करता रहा.
  • इसके निर्यात के कारण भारत को काफी मात्रा में सोना चाँदी प्राप्त होता था.
  • आइने अकबरी के अनुसार लोहे और धातुओं के उपकरण और औजार बंगाल, पंजाब और गुजरात में बनाए जाते थे.
  • सोमनाथ बढ़िया और मजबूत तलवारों के लिए विख्यात था.
  • गया, कश्मीर, सियालकोट और शाहजुदपुर चीड़ की लकड़ी से कागज बनाने के प्रमुख केन्द्र थे.
  • सियालकोट में मानसिंगी एवम् सिल्फ नामक कागज का निर्माण होता था.
  • चमड़े का उद्योग गाँवों और शहरों में फैल हुआ था. इस उद्योग का बाजार अन्तर्देशीय था.
  • उत्तर-प्रदेश, पंजाब, गुजरात, बंगाल आदि में गन्ने पर आधारित गुड़, खाँडसारी, चीनी, शक्कर, मिस्री आदि का निर्माण होता था.
  • कई स्थानों पर शहद की मक्खियां पाली जाती थीं .
  • काँच का उत्पादन बरार, बिहार और फतेहपुरसिकरी में होता था.
  • अन्य कई लघु उद्योग भी अस्तित्व में थे.

मुगल कालीन आयात निर्यात

  • मुगल काल में आन्तरिक तथा बाह्य दोनों व्यापार प्रगति पर थे.
  • आन्तरिक व्यापार पर वैश्य, मारवाड़ी, चैट्टी, बंजारा आदि जातियों का एकाधिकार था.
  • व्यापार जल तथा स्थल दोनों मार्गों से होता था.
  • कैम्बे, सूरत, भड़ौच, गोआ, चटगाँव, सोनार गाँव, मच्छलीपट्टनम, कोचीन, कालीकट इत्यादि प्रमुख बन्दरगाह थे.
  • स्थल मार्ग में मुल्तान और कश्मीर प्रमुख थे.
  • सूती वस्त्र, रेशमी वस्त्र, गर्म मसाला, अफीम, नील, लाख, कालीमिर्च, चीनी आदि निर्यात की प्रमुख वस्तुएँ थी.
  • भारत ईरान से घोड़े, चीन से रेशम तथा चीनी मिट्टी के बर्तन, वेनिस और ईरान से काँच के बर्तन, तथा यूरोपीय शराव, अफ्रीकी दास, सोना-चाँदी इत्यादि का आयात करता था.

मुगल कालीन लेन-देन

  • मुगल काल में कोई व्यवस्थित बैंकिंग प्रणाली और बीमा कम्पनी नहीं थी.
  • ग्रामीण साहूकार और शहरी सर्राफ ऋण लेने-देन का काम करते थे.
  • हुण्डियों के माध्यम से रुपयों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेन-देन होता था.
  • बड़े स्तर के व्यापारियों का जीवन-स्तर बहुत ऊँचा था.
  • छोटे व्यपारी सरकारी अधिकारियों, चोरों तथा डाकुओं के डर से अपनी सम्पत्ति का अधिकांशतः प्रदर्शन नहीं करते थे.
  • उनका जीवन स्तर बहुत ऊँचा नहीं था.

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