साम्प्रदायिक निर्णय तथा पूना समझौता (Communal Award and Poona Pact) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

साम्प्रदायिक निर्णय तथा पूना समझौता (Communal Award and Poona Pact) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)
  • ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत 18 अगस्त, 1932 को साम्प्रदायिक निर्णय प्रस्तुत किया गया.
  • साम्प्रदायिक निर्णय अंग्रेजों के इस मत पर आधारित था कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, बल्कि अनेक जातियों, धार्मिक व सांस्कृतिक गुटों आदि का समूह है.
  • इसके तहत मुसलमानों, दलित जातियों, पिछड़ी हुई जातियों, भारतीय इसाईयों, यूरोपियनों, एग्लो-इण्डियनों, सिक्खों आदि अल्पसंख्यक जातियों के लिए स्थान निश्चित कर दिए गए और प्रत्येक के लिए पृथक-पृथक निर्वाचन मण्डल बना दिए गए.
  • कांग्रेस ने मुस्लिमों, सिक्खों और इसाईयों के लिए पृथक निर्वाचन का विरोध किया क्योंकि इससे देश के सामान्य ढांचे में दरार आने का खतरा था.
  • परन्तु मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन को बहुत पहले 1916 में मुस्लिम लीग के साथ हुए समझौते के तहत स्वीकार किया जा चुका था.
  • परिणामतः साम्प्रदायिक निर्णय के बारे में यह मुश्किल पैदा हो गई थी कि इसे न तो स्वीकार किया जा सकता था और न ही आसनी से अस्वीकार किया जा सकता था.
  • गांधीजी इस समय जेल में थे.
  • अतः उन्होंने जेल से प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसका विरोध किया और आमरण अनशन पर बैठ गए.
  • विभिन्न पार्टियों और सम्प्रदायों के नेता जिनमें- मदन मोहन मालवीय, राजगोपालाचारी, डा. राजेन्द्र प्रसाद, एम. सी. दास और बी. आर. अंबेडकर आदि सम्मिलित थे, तुरन्त सक्रिय हो गए और विभिन्न साम्प्रदायिक प्रतिनिधियों के बीच 26 सितम्बर, 1932 को एक समझौता हुआ जिसे ‘पूना समझौता’ के नाम से जाना गया.
  • इस समझौते में अंबेडकर ने हरिजनों के पृथक प्रतिनिधि की मांग को वापस ले लिया.
  • संयुक्त निर्वाचन सिद्धांत को ही स्वीकारा गया.
  • हरिजनों के लिए सुरक्षित 75 स्थानों को बढ़ाकर 148 कर दिया गया.

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