कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिस्पर्धा (Anglo-French Rivalry in the Carnatic) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिस्पर्धा

  • भारत में ब्रिटिश तथा फ्रांसीसी कम्पनियां मुख्यतः व्यापारिक कम्पनियां थीं, किन्तु शीघ्र ही ये कम्पनियां भारत की राजनीति में अपरिहार्य रूप से उलझती चली गईं.
  • वास्तव में जब मुगल सत्ता क्षीण हो गई तथा दक्कन के सूबेदार इन कम्पनियों की रक्षा करने में असमर्थ साबित हुए तो इन कम्पनियों ने स्वयं ही अपनी रक्षा करने का बीड़ा उठाया.
  • इससे इनका भारत की राजनीति में अधिक उलझ जाना बहुत स्वाभाविक था.
  • भारत में फ्रांसीसियों का मुख्य कार्यालय पांडिचेरी में था तथा अंग्रेजों की मुख्य बस्तियां मद्रास, बम्बई और कलकत्ता में थीं.
  • इनके अलावा इन कम्पनियों के अन्य कार्यक्रम भी थे.
  • आंग्ल-फ्रांसीसी कम्पनियों के मध्य अपने एकाधिकार को स्थापित करने के लिए कर्नाटक में तीन युद्ध हुए.
  • तीसरे युद्ध के बाद फ्रांसीसी कम्पनी की पराजय हुई.

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिस्पर्धा (Anglo-French Rivalry in the Carnatic) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (The First Carnatic war, 1746-48)

  • 1740 में आस्ट्रिया के उत्तराधिकार को लेकर यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस के मध्य संघर्ष प्रारंभ हो गया.
  • कर्नाटक का प्रथम युद्ध इस संघर्ष का विस्तार मात्र ही था.
  • क्योंकि प्रायः जैसे ही यूरोप में इन दोनों शक्तियों के मध्य कोई युद्ध आरंभ हो जाता था, भारत में भी इन दोनों कंपनियों पर प्रभाव पड़ता था.
  • 1746 में आंग्ल-फ्रांसीसी कम्पनियों के मध्य कर्नाटक में युद्ध प्रारंभ हो गया.
  • बारनैट के नेतृत्व में ब्रिटिश नौसेना ने कुछ फ्रांसीसी जलपोतों पर कब्जा कर लिया.
  • पांडिचेरी के फ्रेंच गवर्नर जनरल डूप्ले ने मॉरीशस स्थित फ्रांसीसी गवर्नर ला बुर्डों से सहायता प्राप्त कर ब्रिटिश प्रभुत्व वाले प्रदास नगर को जल एवं थल दोनों ही मार्गों से घेर लिया.
  • कुछ ही समय बाद मद्रास ने आत्मसमर्पण कर दिया.
  • ला बुर्डों ने एक बड़ी धनराशि के बदले मद्रास नगर को वापस ब्रिटेन को लौटा दिया किन्तु डूप्ले इस कार्य से सहमत नहीं था अतः उसने मद्रास को पुनः जीत लिया.
  • परन्तु वह पांडिचेरी से 18 मील दूर दक्षिण में स्थित फोर्ट सेन्ट डेविड नामक स्थान को जीतने में असफल रहा.
  • कर्नाटक का प्रथम युद्ध सेन्ट येमे के युद्ध के लिए भी स्मरणीय है.
  • इस युद्ध का प्रमुख कारण मद्रास पर फ्रांसीसियों का अधिकार होना था.
  • डुप्ले ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन को यह वचन दिया था कि वह मद्रास को जीत कर नवाब को सौंप देगा.
  • किन्तु समय आने पर डूप्ले अपने वादे से मुकर गया.
  • इससे नवाब ने रुष्ट होकर अपनी मांग स्वीकार करवाने के लिए एक विशाल सेना भेजी.
  • कैप्टिन पेराडाइज के नेतृत्व में एक छोटी सी फ्रांसीसी सेना ने नवाब की सेना को अडियार नदी के समीप सेन्ट टोमे नामक स्थान पर पराजित कर दिया.
  • एला शापल की संधि (1748) के बाद यूरोप में आस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध समाप्त हो गया.
  • इसके साथ ही कर्नाटक का प्रथम युद्ध भी समाप्त हो गया तथा मद्रास पुनः अंग्रेजों को प्राप्त हो गया.

कर्नाटक का द्वितीय युद्ध (The Second Carnatic war, 1749-54)

  • 1748 में दक्कन के निज़ाम आसफजाह की मृत्यु हो गई.
  • इसके बाद उसके पुत्र नासिरजंग तथा पौत्र (नासिरजंग का भतीजा) मुजफ्फरजंग के मध्य उत्तराधिकार के लिए संघर्ष प्रारंभ हो गया.
  • कर्नाटक में भी नवाब अनवरुद्दीन तथा उसके बहनोई चन्दा साहिब के मध्य में सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष हो रहा था.
  • डूप्ले ने राजनीतिक अस्थिरता की इस स्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया.
  • उसने मुजफ्फरजंग और कर्नाटक की सूबेदारी का समर्थन किया.
  • अंग्रेजों का समर्थन नासिरजंग और अनवरूद्दीन के साथ था.
  • अगस्त 1749 में डूप्ले के नेतृत्व में मुजफ्फरजंग, चन्दा साहिब और फ्रेंच सेनाओं ने वैल्लौर के समीप अम्बूर नामक स्थान पर अनवरूद्दीन को पराजित कर दिया.
  • 1750 में एक संघर्ष में नासिरजंग भी मारा गया.
  • मुजफ्फरजंग दक्कन का सूबेदार बन गया तथा उसने डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिणी भाग में मुगल प्रदेशों का गवर्नर नियुक्त कर दिया.
  • 1751 में चन्दा साहिब कर्नाटक के नवाब बन गए.
  • इस प्रकार डूप्ले की योजनाएं सफल सिद्ध हुई किन्तु शीघ्र ही उसके समक्ष गम्भीर चुनौतियां प्रस्तुत होने लगी.
  • कर्नाटक की राजधानी अरकाट को क्लाइव ने मात्र 210 सैनिकों की मदद से अपने कब्जे में ले लिया.
  • कर्नाटक का नवाब चन्दा साहिब 4,000 सैनिकों की मदद से भी अरकाट को पुनः प्राप्त न कर सका.
  • 1752 में स्ट्रिगर लोरेन्स के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने त्रिचनापली से भी फ्रांसीसियों को खदेड़ दिया.
  • त्रिचनापली की हार से डूप्ले की सारी योजनाओं पर पानी फिर गया.
  • 1754 में गोडेहू को डूप्ले के स्थान पर भारत में फ्रांसीसी प्रदेशों का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया.
  • अंग्रेजों के प्रत्याशी मुहम्मद अली को कर्नाटक का नवाब बनाया गया.
  • किन्तु हैदराबाद में फ्रांसीसियों की स्थिति अभी भी सुदृढ़ अवस्था में थी.
  • कुल मिलाकर यह कहना होगा कि कर्नाटक के दूसरे युद्ध से फ्रांसीसियों की योजनाओं को कुछ ठेस पहुंची जबकि अंग्रेजों की स्थिति सुदृढ़ हो गई.

कर्नाटक का तृतीय युद्ध (The Third Carnatic War, 1758-63)

  • फ्रांसीसी सरकार ने 1757 में काउन्ट लाली को भारत भेजा.
  • लाली एक वर्ष की लम्बी समुद्री यात्रा के बाद अप्रैल, 1758 में भारत पहुँचा.
  • इस बीच अंग्रेज बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पराजित कर बंगाल पर अधिकार करने में सफल हो चुके थे.
  • इस सफलता से प्राप्त अपार धन के बल पर अंग्रेज फ्रांसीसियों को दक्कन में पराजित करने में सफल हो गए.
  • 1758 में काउन्ट लाली ने फोर्ट सेन्ट डेविड जीत लिया. इसके बाद उसने मद्रास को घेर लिया.
  • किन्तु शीघ्र ही उसे एक शक्तिशाली नौसेना के आने पर अपना घेरा उठाना पड़ा.
  • इसके बाद लाली ने बुस्सी को हैदराबाद से वापस बुलाने की एक गंभीर भूल की.
  • इससे हैदराबाद में फ्रांसीसियों की स्थिति कमजोर हो गई.
  • 1760 में सर आयर कूट ने वन्दिवाश नामक स्थान पर फ्रांसीसियों को बुरी तरह पराजित किया.
  • बुस्सी को बन्दी बना लिया गया.
  • जनवरी, 1761 में दक्कन में फ्रांसीसियों की पूर्णरूपेण पराजय हो गई.
  • इसके बाद फ्रांसीसी पांडिचेरी वापस लौट गए.
  • शीघ्र ही अंग्रेजों ने पांडिचेरी, माही तथा जिजी के फ्रांसीसी प्रदेशों पर भी कब्जा कर लिया.
  • 1763 में पांडिचेरी फ्रांसीसियों को वापस कर दिया गया.

फ्रांसीसियों की असफलता के कारण (Causes of Fallure of the French)

फ्रांसीसियों की पराजय के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

फ्रांसीसियों का यूरोप में उलझना (French Continental Preoccupations)

  • 18वीं शताब्दी के फ्रांसीसी सम्राटों ने यूरोपीय देशों जैसे इटली, बेल्जियम और जर्मनी आदि में अपने साम्राज्य विस्तार के लिए जितना प्रयत्न किया उतना वे भारत तथा उत्तरी अमेरिका के संबंध में न कर पाए.
  • इस कार्य में उनका काफी धन भी व्यय हुआ था तथा कोई विशेष सफलता भी प्राप्त न हो सकी.
  • दूसरी तरफ अंग्रेजों ने यूरोप में केवल शक्ति-संतुलन बनाए रखने तक अपनी भूमिका सीमित रखी.
  • उन्होंने एकाग्रचित से भारत और उत्तरी अमेरिका में अपने साम्राज्य का विस्तार किया.

प्रशासनिक भिन्नताएं (Administrative Differences)

  • फ्रांस की तत्कालीन शासन व्यवस्था या प्रशासनिक प्रणाली को भी फ्रांसीसियों की पराजय के लिए उत्तरदायी माना जाता है.
  • लुई चौदहवें और उसके बाद लूई पन्द्रहवें के शासन काल में फ्रांस की प्रशासनिक व्यवस्था निरन्तर गिरती गई.
  • दूसरी ओर ब्रिटेन ह्लिग (Whigs) दल के अधीन संवैधानिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा था.
  • यह व्यवस्था फ्रांस की राजशाही से उत्तम थी.
  • इसने ब्रिटेन को दिन प्रतिदिन शक्तिशाली बनाया.

कम्पनियों के गठन में भिन्नता (Difference in the Organisation of Companies)

  • फ्रांसीसी कम्पनी एक सरकारी कम्पनी भी.
  • अतः इसके क्रियाकलाप भी सरकारी थे.
  • कम्पनी से जुड़े व्यक्तियों का कम्पनी की समृद्धि से कोई लेना-देना नहीं था.
  • उदासीनता की स्थिति यह थी कि 1725 से 1765 के मध्य कम्पनी के भागीदारों की कोई भी बैठक नहीं हुई.
  • 1721 से 1740 तक कम्पनी उधार के धन से व्यापार करती रही.
  • ऐसी कंपनी डुप्ले की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति न कर सकी.
  • दूसरी ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी एक निजी व्यापारिक कम्पनी थी.
  • ब्रिटेन इस कम्पनी के कल्याण में विशेष रुचि दिखाता था.
  • कम्पनी की वित्तीय स्थिति इतनी सुदृढ़ थी कि लोभवश ब्रिटिश संसद ने 1767 में कम्पनी को आदेश दिया कि वह 4 लाख पौंड वार्षिक ब्रिटिश राजकोष में जमा करवाया करे.

नौसेना की भूमिका (Role of the Navy)

  • कर्नाटक के युद्धों ने यह स्पष्ट किया कि ब्रिटिश नौसेना कितनी शक्तिशाली है.
  • डूप्ले की सफलता काफी हद तक ब्रिटिश नौसेना की निष्क्रियता पर आधारित थी.
  • धीरे-धीरे ब्रिटिश नौसेना सशक्त होती गई जिसके कारण काउन्ट लाली डूप्ले जितनी सफलता प्राप्त नहीं कर सका.

बंगाल में अंग्रेजो की सफलता का प्रभाव (Impact of English Successes in Bengal)

  • अंग्रेजों की सफलता में बंगाल की विजय का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा.
  • बंगाल विजय से अंग्रेजों को अपार धन और जनशक्ति की प्राप्ति हुई.
  • दक्कन बंगाल की तुलना में कम धनी था अतः फ्रांसीसियों को दक्कन की विजय का कोई खास लाभ न हुआ.
  • आगे चलकर लाली के सैनिकों को वेतन देने के लिए भी धन नहीं था.

कम्पनियों का राजनीतिक नेतृत्व (Political Leadership of Companies)

  • फ्रांसीसी कम्पनी का राजनीतिक तथा सैनिक नेतृत्व ब्रिटिश कम्पनी की तुलना में दुर्बल था.
  • डूप्ले, बुस्सी तथा काउन्ट लाली व्यक्तिगत रूप से क्लाइव, लौरेन्स सॉण्डर्स से कम नहीं थे किन्तु वे अपने सैनिकों में क्लाइव के समान जोश न भर सके.
  • डूप्ले एक उत्तम नेता होते हुए भी फ्रांसीसियों की पराजय के लिए उत्तरदायी बना.
  • उसने अपनी महत्वकांक्षाओं के सामने कम्पनी के व्यापारिक तथा वित्तीय पक्षों की अवहेलना की.

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