कवक (Fungi)

कवक (Fungi) की रचना तथा वृद्धि (Fungal Structure and Growth), प्रजनन (Reproduction in Fungi) Fungi कवक का वर्गीकरण (Classification of Fungi)

सामान्य लक्षण (General Characteristics) 

  • कवक (Fungi) पर्णहरित रहित (Non-Chlorophyllous) होते हैं, ये परपोषी होते हैं और इनका शरीर भी सूकाय या थैलस होता है. 
  • ये मुख्यत: नम स्थानों पर पाये जाते हैं जैसे-लकड़ी के सड़े-गले टुकड़े, चमड़े, भोज्य पदार्थ आदि . 
  • कवक की 100,000 से भी अधिक स्पीशीज हैं. 
  • इनमें से कुछ एक कोशिकीय हैं जैसे यीष्ट, कुछ जटिल हैं जैसे मशरूम . 
  • कुछ विषमपोषी जीवाणुओं की तरह कवक भी प्रमुख अपघटक हैं .
  • और जैव मंडल में अकार्बनिक संसाधनों के पुन: चक्रण में उनके कार्य नितान्त आवश्यक हैं. 
  • कुछ परजीवी कवक पौधों तथा जंतुओं में रोग भी उत्पन्न करते हैं. 
कवक (Fungi)

कवक की रचना तथा वृद्धि (Fungal Structure and Growth) 

  • कवक बाह्य कोशिकीय पाचन क्रिया द्वारा अपने पर्यावरण से ऊर्जा प्राप्त करता है. 
  • यह पाचित पदार्थों को घोल के रूप में अवशोषित करता है. 
  • इस कार्य के लिए कवक की रचना तथा उसकी वृद्धि अनुकूल हैं.
  • इनकी कोशिकाएं तंतु के रूप में बढ़ती हैं जिन्हें कवक तंतु (हाइफा) कहते हैं. 
  • अकेले एक बीजाणु से बने कवक तंतु में वृद्धि होती है और उसकी चोटी पर शाखाएं निकलती हैं. 
  • यह शीघ्र ही रूई का एक गुच्छा बन जाता है. जिसे कवक जाल कहते हैं. 
  • तंतुओं की वृद्धि से बना यह बड़ा क्षेत्र अवस्तर से अच्छी प्रकार चिपक जाता है.
  • Fungi में कार्यिक अथवा स्वांगीकारक अवस्थाएं होती हैं, जिसमें पोषक तत्वों का अवशोषण होता है.
  • और कवक जाल अवस्तर पर वृद्धि करता है. 
  • इस अवस्था में कवक कठिनाई से ही दिखाई पड़ता है क्योंकि इसका अधिकांश भाग अवस्तर के अंदर ही होता है. 
  • इस अवस्था के बाद जनन अवस्था आती है. 
  • कवक तंतु में अब वायव वृद्धि आरंभ हो जाती है. 
  • जिससे विभिन्न प्रकार की फलनकाय तथा जनन कोशिकाए अथवा बीजाणु बनते हैं.

कोशिका तथा ऊतक रचना-

  • यूकैरिऑट की भाँति, कवक में प्लैस्टिड अथवा क्लोरोप्लास्ट के अतिरिक्त सभी कोशिकांग होते है. 
  • उनमें केंद्रक तुलनात्मक रूप से छोटे होते हैं.
  • कुछ कवकों में माइटोसिस के समय केंद्रीय आवरण लुप्त नहीं होता जैसा कि पौधा तथा जंतुओं में होता है.
  • अधिकांश कवक की कोशिका-भित्ति काइटिन से निर्मित होती हैं. 
  • काटिन के अंदर नाइट्रोजन युक्त पॉली सैकेराइड होता है. 
  • कुछ कोशिका-भित्ति में केवल सैल्यूलोज होता है, तथा कुछ कोशिका-भित्ति में काइटिन व सैल्यूलोज दोनों ही होते हैं . 
  • काइटिन कीटों की क्यूटिकल में भी उपस्थित होता है, लेकिन यह उच्चवर्गीय पौधों में नहीं होता. 
  • काइटिन अथवा सैल्यूलोज एक अन्य पॉलिसैकेराइड के मैट्रिक्स में होता हो कुछ कवक के कवक तंतु अपटीय होते हैं.
  • अर्थात् कवक वृद्धि के बाद जब केंद्रक विभाजित होता है तब उनके बीच कोई भित्ति नहीं बनती है. 
  • इन कवकों में बहु-केंद्रीय कवक तंतु होता है. 
  • अधिकांश कवकों में पटीय कवक तंतु होते हैं अर्थात् केंद्रक विभाजन के बाद उनके बीच में एक भित्ति बन जाती हैं. 
  • यह भित्ति पूरी नहीं बनती बल्कि इसके बीच में छिद्र रह जाता है जिससे इसका संपर्क साथ वाली कोशिका से बना रहता है. 
  • इस छिद्र के माध्यम से प्रोटोप्लाज्म का संचालन होता है, परन्तु केन्द्रक का नहीं हो पाता. 
  • इस प्रकार प्रौढ़ कवक जालों में संचित भोजन वायवीय कवकजाल अथवा फलनकाय में आसानी से जा सकता है. 

कवक में प्रजनन (Reproduction in Fungi)

  • कवक में अलैंगिक प्रजनन होता है. 
  • इस क्रिया में कवक-जाल के टुकड़े अलग-अलग हो जाते हैं और उनमें पुन: वृद्धि होती है. 
  • ये विशेष कोशिकाओं (कायिक बीजाणु या कोनिडिया) के द्वारा भी प्रजनन करते हैं. 
  • कुछ कवक केवल अलैंगिक प्रजनन क्रिया द्वारा ही प्रजनन करते हैं. 
  • इन कवकों को एक विशेष वर्ग-फंजाई इंपैक्टाई में रखते हैं.
  • कवक के विभिन्न वर्गों में भिन्न-भिन्न प्रकार से लैंगिक प्रजनन होता है. 
  • निम्न वर्ग में आने वाले कवकों में कुछ कवक मुख्यतः जलीय प्रकार, से गतिशील युग्मक बनते हैं और ये जल में ही संगलन करते हैं. 
  • कुछ कवकों में असमान लैंगिक प्रजनन संरचनाएं बनती हैं जिससे नर तथा मादा युग्मक का निर्माण होता है. 
  • स्थल पर पाए जाने वाले कवकों में अलग-अलग प्रकार के संगम प्ररूप होते हैं. 
  • तंतुओं में संगलन केवल असमान संगम प्ररूप के कवकों द्वारा होता है. 
  • अत: जिस प्रक्रिया में समान प्रकार के संगम प्ररूप होते हैं. उसे विषम थैलसता कहते हैं.

बीजाणु (Spore)

  • बीजाणु, कवक की सुस्पष्ट प्रजनन इकाई है. बीजाणु अलैंगिक अथवा लैंगिक प्रजनन द्वारा बन सकते हैं. 
  • Spore बीजाणु कवक से अलग हो जाते हैं और ये दूर-दूर तक बिखर जाते हैं.
  • जलीय कवक के बीजाणुओं में तैरने के लिए फ्लैजिला होते हैं. उन्हें चल बीजाणु कहते हैं. 
  • बहुत से स्थलीय कवकों के बीजाणु हल्के तथा छोटे होते हैं जो हवा द्वारा बिखर जाते हैं. 
  • अनुकूल परिस्थितियों में वे अंकुरित हो जाते हैं. उनमें से कवक तंतु निकलता है जिससे एक नया जीव बन जाता है.
  • अलैंगिक प्रजनन से बनने वाले सभी बीजाणु आनुवंशिक दृष्टि से समान होते हैं. वे कवक को फैलाने में बहुत उपयोगी हैं. 
  • लैंगिक प्रजनन द्वारा बनने वाले बीजाणुओं में आनुवंशिक भिन्नता होती है.
  • कुछ आनुवंशिक विभिन्नताएं स्पीशीज को विभिन्न पर्यावरणों में अच्छी तरह जीवित रखने में उपयोगी होती हैं.

कवक का वर्गीकरण (Classification of Fungi) 

  • Fungi का वर्गीकरण मुख्यत: उनके जीवन चक्र के आधार पर होता है. 
  • कवक में प्रजनन संरचनाओं की अकारिकी तथा बीजाणु बनने की विधि उनके वर्गीकरण के प्रमुख आधार हैं. 
  • शरीर क्रिया विज्ञान तथा जैव रसायन दोनों ही कवक के वर्गीकरण में सहायता करते हैं. 
  • अत:कवक के कुछ मुख्य वर्गों की जीवन विधियों का अध्ययन निम्नलिखित हैं –

जाइगोमाइसिटीज-संयुग्मन कवक

  • इस वर्ग में सामान्य काली ब्रेड मॉल्ड-राइजोपस या उससे संबंधित स्पीशीज म्यूकर आते हैं. 
  • इनमें एक द्विगुणित सुप्त बीजाणु (युग्माणु) बनने के कारण, इन्हें जाइगोमाइसिटीज वर्ग में रखा जाता है.
  • युग्माणु जीवन चक्र के दौरान संयुग्मन से बनता है.
  • इस वर्ग के कवकों के अपटीय, बहुकेंद्रीय कवक तंतुओं में केंद्रक अगुणित होता है. 
  • अलैंगिक प्रजनन के समय, इन कवक तंतुओं से बहुत से वायवीय Fungi तंतु निकलते हैं.
  • ये Fungi तंतु शाखीय होते हैं और इन्हें बीजाणुधानी धर कहते हैं. 
  • प्रत्येक बीजाणुधानी माइटोसिस द्वारा सैकड़ों अगुणित बीजाणु उत्पन्न करता है. वे हवा में काली धूल के समान निकल आते हैं. 
  • इसी कारण बीजाणु सभी स्थानों पर पाये जाते हैं. जैसे-नम तथा सड़ी गली ब्रेड पर भी हो सकते हैं. 
  • जिस पर Fungi जीवित रहते हैं और उससे अपना भोजन ग्रहण करते हैं. 
  • लैंगिक प्रजनन ऐसे दो तंतुओं में होता है जो आकारिकी रूप से समान हों लेकिन उनका संगम प्ररूप विभिन्न हो. 
  • ऐसे तंतुओं को (+) तथा (-) प्रकार के तंतु कहते हैं. दो छोटे कवक तंतुओं के सिरे परस्पर मिलते हैं. और वे कुछ फूल जाते हैं.
  • उनमें बहुत से केंद्रक तथा सघन कोशिका द्रव्य होता है. इनके बीच में एक भित्ति बन जाती है और ये युग्मकधानी के रूप में अलग हो जाते हैं. 
  • जब युग्मकधानी परिक्व हो जाती हैं तब उनके बीच की भित्ति लुप्त हो जाती है और उन दोनों के द्रव्य आपस में मिल जाते हैं.
  • युग्मकधानी के संगलन से युग्माणु बन जाते हैं, जो आकार में बड़े हो जाते हैं और इनके चारों ओर एक मोटी भित्ति बन जाती है. 
  • अत: इस अवस्था में यह प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रह सकता है. 
  • लेकिन अनुकूल परिस्थिति के दौरान युग्माणु अंकुरित हो जाता है जिससे उसमें बीजाणुधानी बन जाता है.
  • इस प्रकार कई तरह के प्ररूपों के अतिरिक्त सभी अगुणित केन्द्रक नष्ट हो जाते हैं. 
  • द्विगुणित केन्द्रक संगलन विधि के द्वारा बनते हैं. इस केंद्रक में मिऑसिस विभाजन होता है और चार बीजाणुओं का निर्माण होता है. 
  • माइटोसिस विभाजन (Mitosis division) द्वारा यह केंद्रक बहुत से अगुणित बीजाणुओं का निर्माण करते हैं.
  • ये बीजाणु अंकुरित होकर + अथवा – प्रकार के अगुणित कवक तंतु बनाते हैं.

ऐस्कोमाइसिटीज-थैली कवक

  • ऐस्कोमाइसिटीज(ऐस्कस = थैला, माइसिटीज-कवक) में विभिन्न प्रकार के कवक आते हैं, जैसे—यीस्ट, बहुत से भूरे व हरे तथा गुलाबी मॉल्ड, कप-कवक तथा खाद्य कवक . 
  • इस वर्ग में कवकों की 30,000 से भी अधिक स्पीशीज आती हैं. 
  • फंजाई इंफैक्टाई के कुछ सदस्यों में लैंगिक जनन की कुछ अवस्थाओं का पता लगाने के बाद ऐसा लगता है कि वे भी ऐस्कोमाइसिटीज वर्ग के सदस्य हैं. 
  • ऐस्कोमाइसिटीज अगुणित कवक है और इसका कवक जाल पटीय होता है. इनमें अलैंगिक प्रजनन के द्वारा बीजाणु एक श्रृंखला में बनते हैं. ये बर्हिजात होते हैं और बीजाणुधानी में नहीं बनते . 
  • ऐसे बीजाणुओं को कोनिडिया कहते हैं. इनका रंग सुस्पष्ट होता है. ब्रेड, फलों तथा चमडे पर उगने वाली हरी-भूरी कवक ऐस्कोमाइसिटीज वर्ग के सदस्य होते हैं. इस वर्ग के कवक पौधों में भी बहुत से रोग फैलाते हैं, जैसेपावडरी मिल्डयू.
  • इस फाइलम का मुख्य गुण यह है कि इनका आकार थैले की भाँति होता है. इन थैलों में लैंगिक जनन द्वारा बने ऐस्कस बीजाणु होते हैं. 
  • दो विरोधी संगम प्ररूप के कवक तंतुओं में लैंगिक संगलन होता है जिसके कारण ऐस्कस बनता है. ऐस्कस में स्थित दो अगुणित केंद्रक संगलित हो जाते हैं. जिसके कारण एक युग्मनज बन जाता है. 
  • युग्मनज में मियोसिस विभाजन (Meiosis division) होता है जिससे ऐस्कस में चार अथवा आठ अगुणित ऐस्कस बीजाणु बन जाते हैं. 
  • इनमें से आधे ऐस्कस बीजाणु + के तथा आधे – प्रकार के होते हैं. ऐस्कस फट जाते हैं और उनसे ऐस्कस बीजाणु बाहर निकल आते हैं. 
  • यीस्ट एक कोशिकीय एस्कोमाइसिटीज है. इनमें अलैंगिक प्रजनन मुकुलन द्वारा होता है लैंगिक जनन के समय उनके ऐस्कस अलग-अलग होते हैं . 
  • यीस्ट कुछ जीवाणुओं की भाँति किण्वन द्वारा वायु के बिना भी जीवित रह सकते हैं. ये विकल्पी वायुजीव हैं. यीस्ट शूगर (ग्लूकोस तथा फ्रक्टोस) से किण्वन विधि द्वारा ईथाइल एल्कोहल बनाता है. 
  • ईथाइल एल्कोहल का उपयोग शराब के रूप में किया जाता है. कैंडिडा स्पीशीज के यीस्ट मनुष्य में त्वचा तथा श्वसन सम्बन्धी रोग उत्पन्न करते हैं.

बेसिडिऔमाइसिटीज-वल्ब कवक

  • बेसिडिऔमाइसिटीज वर्ग में 25,000 से अधिक स्पीशीज होती हैं. इस वर्ग का नाम बेसि डियम से पड़ा है. इस वर्ग की चोटी पर चार बीजाणु (मशरूम, छत्रक, पफबॉल तथा ब्रे केट) होते हैं तथा इसमें जनन कवक तंतु का सिरा गदाकार होता है. 
  • इस वर्ग के सदस्य पौधों में बहुत से हानिकारक रोग, जैसेकिट्ट तथा कंड उत्पन्न करते हैं. बेसिडियों माइसिटीन लकड़ी के अच्छे अपघटक हैं. ये सैल्यूलोज तथा लिग्निन को भी अपघटित कर सकते है.

लाइकेन (Lichens)

  • Lichens (लाइकेन) में एस्कोमाइसिटीज या बेसिडिऔमाइस्टिीज कवक तथा हरे शैवाल या सायनों बैक्टीरिया उपस्थित होते हैं. ये कवक व शैवाल सहजीवी जीवन व्यतीत करते हैं. 
  • लाइकेन में उपस्थित शैवाल सायनोबैक्टीरिया हो तो वह वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन को स्थिर करता है. 
  • कवक लाइकेन को आकृति प्रदान करता है और वृक्ष की छालों, पत्तों चट्टानों आदि से चिपकाएं रखता है. कवक वायुमण्डल में उपस्थित नमी को भी अवशोषित करता है.
  • लाइकेन उस जगह अधिक मात्रा में पाये जाते हैं. जहाँ पर वायु प्रदूषित नहीं होती. इसीलिए ये बंजर चट्टानों, ठंडे हुए ज्वालामुखी लावों और यहाँ तक कि टुंड्रा की बर्फीली मिट्टी में भी पाये जाते हैं. 
  • लाइकेन चट्टान को खुरचते हैं जिससे कुछ खनिज तथा जैविक पदार्थ एकत्र हो जाते हैं. बाद में इस मिट्टी पर अन्य पौधे जैसे मास तथा घास अनुक्रमण में आते हैं. 
  • टुंड्रा क्षेत्र में रंडियर तथा केरिबो (मस्क ऑक्स) जैसे जंतु लाइकेन को भोजन के रूप में उपयोग करते हैं. लाइकेन से बहुत से प्रकार के वर्णक पी एच बनाने वाले लिटिमस प्राप्त होते हैं. लाइकेन का उपयोग औषधि, सुगन्ध आदि में किया जाता है.

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