जन्तुओं में संगठन और जन्तु-ऊतक (Organisation in Animals & Animal Tissues)

जन्तुओं में संगठन और जन्तु-ऊतक (Organisation in Animals & Animal Tissues)

जन्तुओं में संगठन (Organisation in Animals) 

  • जीव एक स्वतंत्र इकाई होता है, परन्तु अपने अस्तित्व के लिए इस दूसरे जीवों पर निर्भर रहना पड़ता है. 
  • इस प्रकार की परस्पर सहजीविता को जीवों का संगठन कहते हैं.

जाति

  • जीवधारियों के उस समूह को जाति कहते हैं जो आपस परस्पर संकरण द्वारा संतान उत्पन्न करते हैं, जैसे-मानव, गाय आदि . 
  • एक जाति के जीव दूसरी जाति के जीव के साथ संकरण करके संतान उत्पन्न नहीं कर सकते हैं. – 

समष्टि (Population)

  • एक जाति के सदस्यों का वह समूह जो किसी निश्चित क्षेत्र या वातावरण में रहता है, समष्टि (Population) कहलाता है.

जैवसमुदाय

  • एक से अधिक जाति के सदस्यों से बनी समष्टियों का वह समूह जो किसी विशेष स्थान पर रहता है. उसे जैव समुदाय कहते हैं. 
  • जैव समुदाय में जन्तु एवं वनस्पतियाँ दोनों हो सकते हैं. 

जन्तु-ऊतक (Animal Tissues)

  • जन्तुओं में प्रमुख चार प्रकार के ऊतक पाये जाते हैं

(1) उपकला या एपीथीलियमी ऊतक (Epithelial Tissues)

  • ये ऊतक शरीर तथा अंतरांगों की बाहरी तथा भीतरी उघड़ी (Exposed) सतहों पर, रक्षात्मक चादर या छीलन (Peeling) की भाँति ढके रहते हैं, 
  • अतः ठोस अन्तरांगों (जीभ, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि) पर बाहर तथा त्वचा एवं खोखले अन्तरागों (श्वास-नाले, आहारनाल, रूधिरवाहिनियाँ आदि) पर भीतर व बाहर इसी ऊतक की एक या अधिक परते आच्छादत्त होती है. 
  • उपकला (Epithelial) ऊतक, भ्रूणीय परिवर्धन में एक्टोडर्म, मीसोडर्म एवं एन्डोडर्म तीन प्राथमिक रोहिस्तरों (Primary Germinal Layers) से बनती है.
  • भ्रूण में एक्टोडर्म और एन्डोडर्म स्तरों के बीच में कोशिकाओं का एक ढीला-सा तीसरा स्तर, मीसोडर्म होता है. 
  • इस स्तर से बनने वाले वयस्क के सारे ऊतकों (Tissue) को हर्टविग (1883) ने ‘मीसेनकाइमा‘ का नाम दिया. 
  • भ्रूणीय परिवर्धन के दौरान, इस स्तर के कुछ भाग तो सघन होकर वयस्क के कंकालीय तथा पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) बनाते हैं और शेष ढीले रहकर संवहनीय और संयोजी ऊतक (Connective Tissue) बनाते हैं. 
  • पेशीय ऊतकों (Muscular Tissue) के अतिरिक्त अन्य सभी मीसोडर्मी ऊतकों को वयस्क के संयोजी ऊतकों की श्रेणी में रखा जाता है.

(2) संयोजी ऊतक (Connective Tissue)

  • यह ऊतक अन्य ऊतकों को एक साथ बाँधकर उन्हें मजबूती एवं सहारा देने का कार्य करता है. 
  • इस ऊतक की कोशिकाएँ एक निर्जीव माध्यम में बिखरी होती हैं जिसे अधात्री (Matrix) कहते हैं. 
  • यह ऊतक चोट से नष्ट होने वाले ऊतकों की स्थानपूर्ति करता है तथा शरीर में प्रवेश करने वाले रोगाणुओं की भी रोकथाम करता है.

आयुकरण (Aging)

  • संयोजी ऊतकों के मैट्रिक्स का आयुकरण के साथ मुख्य सम्बन्ध होता है. 
  • बच्चों में यह अधिकतर लसदार मात्रा में पाये जाते हैं क्योंकि बच्चों में तन्तुओं की संख्या कम होती है.
  • जैसे-जैसे आयु में वृद्धि होती है वैसे-वैसे तन्तुओं की मोटाई और संख्या में वृद्धि होती है. 
  • कुछ स्थानों पर जैसे रक्तवाहिनियों की दीवारों में, जन्तुओं की निकट कैल्शियम लवणों का भी जमाव होने लगता है. 
  • इसी कारण इस दीवार का लचीलापन कम होता जाता है और ऊतकों में रक्त की आपूर्ति (Supply) होती जाती है. 
  • इस प्रकार धीरे-धीरे सभी ऊतकों की क्रिया क्षमता और दक्षता में गिरावट आती जाती है. इसी क्रिया को आयुकरण (Aging) कहते हैं.

कंकाल ऊतक (Skeletal Tissue)

  • कशेरूकियों (Vertebrates) में पूरे शरीर को नापने और इसकी आकृति बनाए रखने के लिए दृढ़ अन्तः कंकालीय ढाँचा (Endoskeletal Frame Work) होता है.
  • यह एक विशेष प्रकार के सघन संयोजी ऊतक (Dense Connective Tissue) का बना होता है जिसे कंकाल ऊतक (Skeletal Tissue) कहते हैं. 

रुधिर (Blood) एवं लसीका, विशेष प्रकार के तरल संयोजी ऊतक (Connective Tissue) होते हैं, जिनका कि सारे शरीर में संचारण होता है. भ्रूण (Embryo) की मीसोडर्म से रूधिर की उत्पत्ति होती है.

(3) पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)

  • पेशीय ऊतक जन्तुओं के शरीर की मांस पेशियों का निर्माण करते हैं जो जन्तुओं में गति के लिए उत्तरदायी होते हैं. 
  • अतः अधिकाशं बहुकोशीय जन्तुओं में गमन और अंगों की गति के लिए विशेष प्रकार की कोशिकाओं के ऊतक (Tissue) होते हैं. 
  • इन्हें पेशीय ऊतक या पेशियां (Muscles) कहते हैं और इनकी कोशिकाओं को पेशीय कोशिकाएं कहते हैं. 
  • ये ऊतक भ्रूण (Embryo) की मीसोडर्म से बनते हैं (केवल आँखों की आइरिस और सिलियरीकाय की पेशियाँ ऐक्टोडर्म से बनते हैं). 
  • पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) शरीर के भार का लगभग आधे अंश का निर्माण करते हैं. 
  • ये कोशिकाएं लम्बी व संकरी होती हैं, इसीलिए इन्हें पेशी तन्तु (Muscle Fibres) भी कहते हैं. 
  • पेशीय कोशिकाओं का मुख्य लक्षण आकुंचनशीलता (Contractility) होता है. 
  • पेशियाँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं

(A) रेखित पेशियाँ (Striated or Striped Muscles)

  • शरीर में उपस्थित अधिकांश पेशियां रेखित पेशियाँ होती हैं. 
  • ये पेशियाँ शरीर के भार का 40% बनाती हैं. 
  • ये पेशियाँ परिधीय और केन्द्रीय तन्त्रों के नियन्त्रण में जन्तु की इच्छानुसार कार्य करती हैं. 
  • अतः इन्हें ऐच्छिक पेशियां (Voluntary Muscles) भी कहते हैं. 
  • अधिकांश रेखित पेशियां अपने दोनों सिरों पर हड्डियों से जुड़ी होती हैं. 
  • अतः इन्हें कंकालीय पेशिया (Skeletal Muscles) कहते हैं. 
  • हाथ-पैर की गति तथा शरीर की गतियाँ एवं गमन इन्हीं पेशियों द्वारा होता है.
ऑक्सीजन-ऋण (Oxygen-Debt)
  • सक्रिय शारीरिक कार्य या व्यायाम के समय पेशियों में ऊर्जा का व्यय अधिक मात्रा में होता है और अधिकांश ए.टी.पी. (ATP) ए.डी.पी. (ADP) में बदल जाती है. 
  • जिसके पश्चात् ग्लूकोस का जारण (Oxidation) तेजी से होने लगता है, परन्तु फेफड़े (Lungs) इसके लिए आवश्यक ऑक्सीजन (O2) की पूर्ति नहीं कर पाते जिससे साँस फूलने लग जाती है. 
  • इस क्रिया को शरीर का ऑक्सीजन ऋण (Oxygen Debt) कहते हैं. 
  • व्यायाम क्रिया के काफी समय पश्चात् तक हम जल्दी-जल्दी साँस लेकर इस ऑक्सीजन ऋण को समाप्त कर देते हैं, अर्थात् हम हवा में उपस्थित ऑक्सीजन की अधिक से अधिक मात्रा लेकर पेशियों के जारण (Oxidation) द्वारा उत्पन्न ए.टी.पी. के असाधारण व्यय की पूर्ति करते हैं. 
  • इसी कारण जिन व्यक्तियों की पेशियों में ग्लूकोज की कमी होती है, वे अधिक मेहनत का काम नहीं कर सकते हैं. 
कैंपकपी (Shivering)
  • कँपकपी क्रिया का उद्देश्य शरीर के ताप को बढ़ाना है. 
  • जाड़े में कभी-कभी क्षणभर के लिए हमें अपने आप कँपकपी आ जाती है. 
  • यह कंकाल पेशियों की एक अनैच्छिक क्रिया होती है.
थकावट (Fatigue) 
  • यदि पेशियों को कुछ समय तक निरंतर आकुंचन क्रिया करनी पड़े तो इनमें आकुंचन क्रिया की क्षमता लगाता कम होती जाती है और पेशियों में लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid) के जमा हो जाने के कारण इनमें आकुंचन क्रिया बिल्कुल बन्द हो जाती है. इसी को थकावट (Fatigue) कहते हैं. 
  • कुछ समय पश्चात् लैक्टिक अम्ल धीरे-धीरे ग्लूकोस में बदल जाती है और थकावट की दशा समाप्त हो जाती है.

(B) अरेखित या अनैच्छिक पेशियाँ (Unstriped, Smooth Or Involuntary Muscles)

  • ये पेशियाँ शरीर की उन गतियों को नियंत्रित करती हैं जिनका संचालन हमारी इच्छा के अधीन नहीं होता है. 
  • इसी कारण इन पेशियों को अनैच्छिक पेशी भी कहते हैं. 
  • ये पेशियाँ आहारनाल, मूत्राशय, पित्ताशय, श्वसन नालों, प्लीहा, नेत्रों, त्वचा, गर्भाशय, योनि, जननांगों एवं रूधिरवाहिनियों आदि में होती हैं इसीलिए इन्हें अंतरांगीय पेशियाँ (Visceral Muscles) भी कहते हैं. 
  • अस्थियों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता है. 
  • त्वचा में बालों से सम्बन्धित ऐरेक्टर पिलाई (Arrector Pilli) पेशियाँ तथा शिश्न का स्पंजी पेशी जाल भी अरेखित पेशी ऊतक होते हैं.
  • इन पेशियों का आंकुचन स्वायत्त तन्त्र (Autonomous Nervous System) के नियन्त्रण में धीरे-धीरे प्रायः एक निश्चित क्रम या लय (Rhythm) में स्वतः, यन्त्रवत् होता रहता है, इस पर जन्तु इच्छा शक्ति का नियन्त्रण नहीं होता है. 
  • अतः अंतरांगों का संकुचन, नालवत् अंतरागों की गुहा का फैलना या सिकुडना, आहारनाल की तरंग-गति peristalsis) आदि क्रियाएं इन्हीं के संकुचन पर निर्भर करती हैं.
हृदय पेशियाँ (Cardiac Muscles)
  • केशरूकियों (Vertebrates) के हृदय की दीवार का अधिकांश भाग हृद-पेशियों का बना सा जिसे मायोकार्डिम (Myocardium) कहते हैं. 
  • इन पेशियों के कुछ लक्षण रेखित और कुछ अरेखित पेशियों के होते हैं. 
  • इन पेशियों में छोटे लेकिन मोटे व बेलनाकार पेशी तन्तु रेखित होते हैं 
  • और इनमें केवल एक या कभी-कभी दो केन्द्रक होते हैं. 
  • ये तन्तु कुछ शारवान्वित होकर परस्पर जुड़े होते हैं. 
  • केवल इन्हीं पेशियों में पेशी तन्तु सिरों पर अंगुली-जैसे प्रबंधों (Interdigilations) द्वारा परस्पर गुँथे रहते है. 
  • इन्हीं स्थानों को पहले अन्तर्विष्ट पट्टियाँ (Intercalated Dises) कहते हैं. 
  • स्वभाव में हृदय पेशियां अन्य पेशियों से भिन्न होती हैं और ये स्वायत्त तन्त्रिका तन्तुओं से सम्बन्धित होती हैं. 
  • हृदय पेशियों (Cardiac Muscles) का सबसे विशिष्ट लक्षण यह होता है कि यह जन्तु की इच्छा से स्वतन्त्र अपने आप (Automatically) बिना थके, बिना रूके एक लय से (Rhythmically) और मनुष्य में लगभग 72 बार प्रति मिनट की दर से, जीवन भर आकुंचन करती रहती हैं. 
  • हृदय की इस क्रिया को धड़कन (Heart Beat) कहते हैं . 
  • स्पष्ट है कि इनमें ए.टी.पी. (ATP) का सबसे अधिक व्यय होता है. 
  • इसीलिए पूरे शरीर में इन्हीं कोशिकाओं में माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) सबसे अधिक व जटिल होते हैं. 
  • इन पेशियों का संकुचन तन्त्रिजनक (Neurogenic) नहीं होता, अर्थात् यह तन्त्रिका प्रेरणा के कारण नहीं होता, क्योंकि ये अन्तभूर्त (Inherent) और पेशीजनक (Myogenic) होता है.
पेशियों में वृद्धि एवं क्षय
  • यदि पेशियों को बहुत अधिक कार्य करना पड़े तो धीरे-धीरे इन पेशियों के तन्तु मोटे हो जाते हैं. 
  • इसे पेशी की अतिवृद्धि (Hypertrophy) कहते हैं. 
  • गर्भवती स्त्रियों के गर्भाशय की पेशियों में हॉरमोन्स के प्रभाव से अतिवृद्धि हो जाती है. 
  • इससे गर्भाशय कई गुना बड़ा हो जाता है. 
  • यदि किसी पेशी को काफी समय तक कार्य न करना पड़े तो उसके तन्तु पतले हो जाते हैं. 
  • इसे पेशी का क्षय (Atrophy) कहते हैं.

(4) तन्त्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue)

  • यह ऊतक जन्तु शरीर के भीतर होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं पर नियंत्रण रखता है.
  • बाह्य वातावरण के उद्दीपनों में संवेदनों को ग्रहण करता है .
  • शरीर के सभी अंगों के कार्यों में सामंजस्य स्थापित करता है.

भ्रूणीय परिवर्धन (Embryonic Development)

  • भ्रूणीय परिवर्धन (Embryonic Development) में एक बार बंध जाने के बाद तन्त्रिका कोशिकाएँ कभी विभाजित नहीं होती वरन् जीवन भर अन्तरावस्था (Interphase) में रहती है और शरीर में वृद्धि होने के साथ-साथ ये भी बड़ी हो जाती है. 
  • मस्तिष्क की कुछ तन्त्रिका कोशिकाओं में मिलैनिन (Melanin) रंगा होती है. 
  • मादा की तन्त्रिका कोशिकाओं के केन्द्रक में केन्द्रिका के निकट प्रायः एक “बार काय” .(Bar Body) होता है जो एक्स (X) गुणसूत्र के रूपान्तरण से बनता है. 
  • तन्त्रिका कोशिकाओं के कोशापिण्ड, अधिकांश केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central Nervous System) मुख्यतः मस्तिष्क के धूसर द्रव्य (Grey Matter) में होते हैं. अतः केन्द्रीय तन्त्र के बाहर थोड़े से गैंग्लिया (Ganglia) रहते हैं. 
  • मस्तिष्क के अनुमस्तिष्क (Cerebellum) में फ्लास्क की आकृति के कोशिका पिण्ड होते हैं. 

इन्हें पुरकिन्जे की कोशिकाएं (Purkinge Cells) कहते हैं.

जीवधारी की बनावट (Organisation in the Living Organisms) पादप ऊतक (Plant Tissues)

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