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क्रान्तिकारी-आतंकवाद का दूसरा चरण (Second Phase of Revolutionary Terrorism) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

क्रान्तिकारी-आतंकवाद का दूसरा चरण (Second Phase of Revolutionary Terrorism) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन Indian National Movement

क्रान्तिकारी-आतंकवाद का दूसरा चरण (Second Phase of Revolutionary)

  • असहयोग आंदोलन के पूर्णतया असफल होने से आतंकवाद में पुनः उग्रता आई.
  • अक्टूबर, 1924 में समस्त क्रान्तिकारी दलों का कानपुर में एक सम्मेलन बुलाया गया, जिसमें सचिन्द्रनाथ सान्याल, जगदीश चन्द्र चैटर्जी तथा राम प्रसाद बिस्मिल जैसे पुराने क्रान्तिकारी नेताओं तथा भगत सिंह, शिव वर्मा, सुख देव, भगवतीचरण वोहरा तथा चन्द्रशेखर आजाद जैसे युवा क्रान्तिकारियों ने भाग लिया.

क्रान्तिकारी-आतंकवाद का दूसरा चरण (Second Phase of Revolutionary Terrorism) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन Indian National Movement

भारतीय गणतंत्र समिति अथवा सेना (Hindustan Republican Association or Army)

  • 1924 में ‘भारतीय गणतंत्र समिति अथवा सेना’ (Hindustan Republican Association or Army) का जन्म हुआ तथा बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब तथा मद्रास आदि प्रान्तों में की शाखाएं स्थापित की गई.
  • इस दल (भारतीय गणतंत्र समिति अथवा सेना) के निम्नलिखित तीन प्रमुख आदर्श थे –
  1. भारतीय जनता में महात्मा गांधीजी की अहिंसावाद की नीतियों की निरर्थकता के प्रति जागृति उत्पन्न करना.
  2. पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष कार्यवाही तथा क्रान्ति की आवश्यकता का प्रदर्शन करना.
  3. अंग्रेजी साम्राज्यवाद के स्थान पर समाजवादी विचारधारा से प्रेरित संयुक्त राज्य भारत में संघीय गणतंत्र की स्थापना करना.

काकोरी षड्यंत्र

  • इन्होंने अपने कार्यों के लिए धन एकत्रित करने हेतु सरकारी कोषों को अपना निशाना बनाने का निश्चय किया.
  • 9 अगस्त, 1925 को क्रान्तिकारियों ने सहारनपुन-लखनऊ लाइन पर काकोरी जाने वाली गाड़ी को सफलतापूर्वक लूटा.
  • इस सम्बन्ध में 1925 में काकोरी षड्यंत्र केस नामक मुकदमा चलाया गया.
  • सत्रह लोगों को लम्बी सजाएं, चार को आजीवन कारावास तथा रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह तथा रोशनालाल समेत चार लोगों को फांसी दे दी गई.

भगत सिंह और चन्द्र शेखर आजाद 

  • क्रान्तिकारी जल्दी ही समाजवादी विचारों के प्रभाव में आ गये तथा वे अब धीरे-धीरे व्यक्तिगत वीरता के कामों और हिंसात्मक गतिविधियों से भी दूर हटने लगे.
  • परन्तु 30 अक्टूबर, 1928 को साइमन कमीशन विरोधी एक प्रदर्शन पर पुलिस के बर्बर लाठी चार्ज के कारण एक आकस्मिक परिवर्तन आया.
  • इसमें लाठियों की चोट खाकर पंजाब के महान नेता लाला लाजपत राय शहीद हो गये.
  • अतः इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद और राजगुरु ने लाहौर के सहायक पुलिस कप्तान साण्डर्स की 17 दिसम्बर, 1928 को हत्या कर दी.
  • पुलिस ने जन-साधारण पर दमन-चक्र चलाया.
  • लोगों में यह भावना सी हो गई कि क्रान्तिकारी तो निकल भागते हैं और जनता पिस जाती है.
  • इस पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय विधान भवन में 8 अप्रैल, 1929 को खाली बेंचों पर बम मारे और गिरफ्तार हो गए.
  • उनकी इच्छा किसी की हत्या करने की नहीं थी, बल्कि आतंकवादियों के एक पर्चे के अनुसार “बहरों को सुनाना” था.
  • वे जानबूझकर इसलिए गिरफ्तार हुए क्योंकि वे क्रान्तिकारी प्रचार के लिए अदालत को एक मंच के रूप में उपयोग करना चाहते थे.
  • 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई.

चटगांव सरकारी शास्त्रागार

  • अप्रैल, 1930 में चटगांव के सरकारी शास्त्रागार पर क्रान्तिकारियों ने योजनाबद्ध ढंग से एक बड़ा छापा मारा.
  • इसका नेतृत्व सूर्यसेन ने किया.
  • सूर्यसेन बाद में पकड़े गए और 1933 में फांसी पर लटका दिए गए.
  • क्रान्तिकारी आतंकवाद का आंदोलन बहुत जल्दी समाप्त हो गया, हालांकि इक्कीदुक्की घटनाएं अनेक वर्षों तक जारी रही.
  • चन्द्र शेखर आजाद ने 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के एक पार्क में पलिस से मुकाबला करते हुए अन्तिम गोली खुद को मार ली और शहीद हो गए.
  • सरकार ने सैकड़ों अन्य क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर उन्हें लम्बी-लम्बी सजाएं दी तथा अनेकों की अंडमान की सेलुलर जेल भेज दिया.

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