भारतीय इतिहास

महमूद गजनवी के उत्तराधिकारी और गजनवी साम्राज्य का पतन

महमूद गजनवी के उत्तराधिकारी और गजनवी साम्राज्य का पतन

महमूद गजनवी के उत्तराधिकारी-1030 ई. में महमूद की मृत्यु के पश्चात् उसके दो पुत्रों-मसूद गज़नी तथा मुहम्मद गज़नी में सिंहासन के लिए संघर्ष हुआ. मसूद ने मुहम्मद गज़नी को अन्धा करवा कर कैद में डाल दिया. मसूद गज़नी ने अपने काल में कुछ सैनिक सफलताएं भी प्राप्त कीं, मगर 24 मार्च 1040 ई. को वह दण्डनकन नामक […]

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महमूद गजनी (गज़नवी) के आक्रमणों के प्रभाव-मध्यकालीन भारत

महमूद गजनी (गज़नवी) के आक्रमणों के प्रभाव-मध्यकालीन भारत

महमूद गजनी (गज़नवी) के आक्रमणों के प्रभाव इस प्रकार है- – भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ. – महमूद गजनवी के आक्रमणों का आर्थिक प्रभाव भारतीय शहरों तथा मन्दिरों पर अच्छा नहीं पड़ा. यहाँ से लूटी धनराशि से उसने एक विशाल तथा स्थाई सेना रखी, जिसने उसके साम्राज्य की मध्य एशियायी

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महमूद गजनी (गज़नवी) के सत्रह आक्रमण और उद्देश्य

महमूद गजनी (गज़नवी) के सत्रह आक्रमण और उद्देश्य-मध्यकालीन भारत

महमूद गजनी (गज़नवी) के सत्रह आक्रमण और उद्देश्य-प्रसिद्ध इतिहासकार हबीब, जाफर तथा लेनपूल आदि का मत है कि महमूद गजनी (गज़नवी) का भारत पर आक्रमण करने का उद्देश्य ‘धन प्राप्ति’ था. वस्तुतः आजकल महमूद गजनी के आक्रमणों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य ‘धन प्राप्ति’ ही माना जाता है. कई विद्वानों ने इस विषय में विभिन्न मत दिए

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तुर्को का आगमन (Advent of Turks) मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

तुर्को का आगमन (Advent of Turks) मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

तुर्को का आगमन (Advent of Turks)-नवीं शताब्दी के अन्त में ट्रांस-ऑक्सियाना, खुरासान तथा ईरान के कुछ भागों पर सामानी शासकों का राज्य था, जो मूलतः ईरानी थे. इन्हें अपनी उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर निरन्तर तुर्की से संघर्ष करना पड़ता था. तुर्क अधिकतर प्रकृति की शक्तियों की पूजा करते थे अतः मुसलमानों की दृष्टि में

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अरबों की सिंध की विजय एक घटना मात्र है MEDIEVAL INDIA

अरबों की सिंध की विजय एक घटना मात्र है (MEDIEVAL INDIA)

अरबों की सिंध की विजय एक घटना मात्र है शक्तिशाली राजपूत राजाओं ने अरबों को सिन्ध से खदेड़ दिया (1) अरब में खिलाफत के लिए उमैय्यदों और अबासिदों में संघर्ष छिड़ गया तथा अबासिद नए खलीफा बने जिन्हें सिन्ध के प्रति अधिक रुचि नहीं थी. फलस्वरूप सिंध पर अरबों का नियन्त्रण ढीला पड़ गया. (2)

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अरबों की सिंध विजय और उसके प्रभाव-मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

अरबों की सिंध विजय और उसके प्रभाव-मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

अरबों की सिंध विजय और उसके प्रभाव–डा. स्टैनले लेनपूल के अनुसार “यह एक ऐसी विजय थी जिसका कोई परिणाम नहीं निकला.” डा. ए. एल. श्रीवास्तव का विचार है कि “यह समझना गलत है कि अरब विजय ने भारतवासियों को प्रभावित ही नहीं किया, उसने हमारे देश में इस्लाम का बीज बोया.’ अरबवासी ही सर्वप्रथम इस्लाम

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अरबों की विजय के कारण और उनकी शासन व्यवस्था

अरबों की विजय के कारण और उनकी शासन व्यवस्था (MEDIEVAL INDIA)

अरबों की विजय के कारण (1) अरब सैनिकों को नूतन अरब रणनीति का व्यवहारिक प्रशिक्षण प्राप्त था तथा अरबों के पास अच्छी नस्ल के सैनिक-घोड़े थे. (2) मुहम्मद-बिन-कासिम का योग्य सैनिक नेतृत्व. (3) राजा दाहिर निरकुंश, अयोग्य, धर्मान्ध व अलोकप्रिय था. उसने अरबों को सिन्धु नदी के पार ही रोकने का प्रयत्न नहीं किया. (4)

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अरबों द्वारा सिंध की विजय MEDIEVAL INDIA

अरबों द्वारा सिंध की विजय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

अरबों द्वारा सिंध की विजय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)–चीनी यात्री ह्वेनसाँग के समय सिन्ध में शूद्र शासक का राज्य था. शूद्र वंश का अन्तिम शासक साहसी (Sahasi) था. उसके उपरान्त उसुके ब्राह्मण मन्त्री छाछा (Chhachha) ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी विधवा रानी से विवाह कर लिया. छाछा के पश्चात् क्रमशः चन्द्र

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इस्लाम का उदय MEDIEVAL INDIA

इस्लाम का उदय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

इस्लाम का उदय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA) –इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगम्बर मुहम्मद साहब थे. कुर्रेश जनजाति के हाशिम के पुत्र अब्दुल्ला के यहाँ मुहम्मद साहब का जन्म लगभग 570 ई. में अरब के मक्का नामक स्थान पर हुआ. उनके जन्म से पूर्व उनके पिता का और उनकी छह वर्ष की आयु में उनकी माता

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स्वराजवादी Swarajists स्वराज पार्टी की स्थापना Swaraj Party

स्वराजवादी (Swarajists)स्वराज पार्टी की स्थापना (Swaraj Party)

स्वराजवादी (Swarajists)स्वराज पार्टी की स्थापना (Swaraj Party)-असहयोग आन्दोलन और खिलाफत आन्दोलन की समाप्ति के उपरान्त 1922-28 के बीच देश की राजनीति में अनेक घटनाएं घटित हुई. नेताओं के बीच आन्दोलन के बाढ़ की निष्क्रियता से बचने के लिए उठाये जाने वाले कदमों के बारे में गहरे मतभेद थे. एक ओर जहां पंडित मोतीलाल नेहरु और

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