प्राकृतिक श्रोत (Natural Sources)  भूगर्भ - पृथ्वी का आंतरिक भाग (Interior of the Earth)

(1) ज्वालामुखी-क्रिया (Volcanic Activities) : 

  • जब कभी भी ज्वालामुखी के उद्गार की प्रक्रिया शुरू होती है उस समय पृथ्वी के अन्दर से गर्म और तरल लावे की धरती पर आगमन शुरू हो जाता है जो कि वहां विशाल मैमा भण्डार के रूप में स्थित है. 
  • यह इस बात का प्रमाण है कि पृथ्वी की गहराई मे कम से कम एक ऐसी परत अवश्य है जो कि सदैव तरल अवस्था में रहती है. 
  • लेकिन यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि पृथ्वी के ऊपरी भाग से पड़ने वाला भारी दबाव आंतरिक भाग की चट्टानों को द्रव अवस्था में आने नहीं देगा. 
  • इस प्रकार आंतरिक भाग ठोस होगा न कि तरल . कभी-कभी यह संभव हो सकता है कि पृथ्वी के ऊपरी भाग पर दरार आदि पड़ने से चट्टान का दबाव कम हो जाता है जिससे चट्टान का गलनांक बिंदु गिर जाता है, जिस कारण चट्टान वहाँ पर स्थित अधिक ताप के कारण पिघल कर ज्वालामुखी के रूप में प्रकट हो जाती है. 
  • इस तरह ज्वालामुखी प्रक्रिया से भी पृथ्वी के अन्तःकरण की बनावट के विषय में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती है.

(2) भूकम्पी तरंगों के साक्ष्य (Evidences from Earthquake waves): 

  • भूगर्भ की जानकारी का सही ज्ञान हमें भूकम्पी तरंगों से होता है. 
  • भूकम्पीय लहरों का सीसमोग्राफ (Seismograph) यंत्र द्वारा अंकन करके अध्ययन किया जाता है. 
  • जिस जमीन के माध्यम से तरंगे गुजरती हैं वह यदि ठोस अवस्था में है तो तरंगों का आचरण एक प्रकार का होता है और यदि वह तरल अवस्था में है तो तरंगों का आचरण दूसरे प्रकार का होता है. 
  • तरंगों की गति दोनों स्थितियों में भिन्न होती है. 
  • पृथ्वी के जिस स्थान से भूकंप का जन्म होता है उसे भूकंप मूल (Focus) एवं धरती पर जहां सबसे पहले भूकंप का अनुभव किया जाता है उसे अधिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं. 
  • यह स्थान भूकम्पमूल के बिल्कुल ऊपर लम्बवत् धरातल पर स्थित होता है. 
  • ये तरंगें तीन प्रकार की होती हैं –

(i) ‘पी’ तरंगें या प्राथमिक या अनुदैर्ध्य तरंगें (‘P’ Wave or Primary or Longitudinal Wave) : 

  • इसकी गति गहराई के साथ-साथ बढ़ती जाती है. ये बहुत ही तेज गति से और सीधी रेखा में चलती हैं. 
  • लेकिन यह गति बढ़ने का क्रम सिर्फ 2900 किमी. की गहराई तक ही सीमित रहता है. 
  • इसके पश्चात् गति कम हो जाती है.

(ii) ‘एस’ तरंगें या द्वितीय या अनुप्रस्थ तरंगें (‘S’ wave or Secondary or Transverse Wave) : 

  • इसकी भी गति पृथ्वी की गहराई के साथ बढ़ती है और इसमें कणों की गति लहर की दिशा को समकोण पर काटती है. 
  • इस तरंग की खास विशेषता है कि यह 2900 किमी. की गहराई के बाद काम करना बन्द कर देती है और पृथ्वी के आंतरिक भाग के द्रव पदार्थ में लुप्त हो जाती है.

(iii) ‘एल’ तरंगें या धरातलीय या लंबी तरंगें (‘L’ Wave or Surface or Longitudinal Wave) : 

  • यह तरंगें धरातल पर चलती हैं और पृथ्वी के ऊपरी भाग को प्रभावित करती हैं. 
  • ये तरंगें अन्य तरंगों की अपेक्षा सबसे लम्बा मार्ग तय करती हैं. 
  • यद्यपि इनकी गति सबसे कम होती है तथापि ये सबसे अधिक भयंकर होती हैं. 
  • जब कभी भी भूकंप आता है तो भूकंप केन्द्र पर इन तरंगों का अंकन किया जाता है. 
  • सर्वप्रथम लघु अथवा कमजोर कम्पन (Tremor) आता है जिसे प्राथमिक कम्पन (Preliminary Tremor) के नाम से जाना जाता है. 
  • कुछ अन्तराल के बाद दूसरा अपेक्षाकृत कुछ अधिक प्रभावशाली कम्पन आता है जिसे द्वितीयक कम्पन (Secondary Tremor) के नाम से जाना जाता है. इसके बाद अधिक अवधि वाला मुख्य कम्पन (Main Tremor) आता है. इस प्रकार ये तीनों कम्पन क्रमशः पी. (P), एस (S) और एल (L) लहरों द्वारा प्रदर्शित होते हैं.
Wave
  • इन तरंगों की गति और चलने के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भाग के विषय में जानकारी मिलती है. 
  • भूकम्पीय लहरें प्रायः ठोस भाग से होकर गुजरती हैं और एक ही स्वभाव वाले ठोस भाग में ये तरंगें एक सीधी रेखा मे सीधे मार्ग से चलती हैं. 
  • इन प्रमाणों के आधार पर अगर पृथ्वी एक ही प्रकार की घनत्व वाली चट्टानों से बना हुआ एक भाग होती तो भूकंपीय तरंगें एक समान गति से पृथ्वी के अन्तरतम तक सीधी रेखा में पहुंच जाती. 
  • लेकिन भूकंप केंद्रों पर इन लहरों के अंकन से जानकारी मिलती है कि ये लहरें एक सीधी दिशा में न चलकर वक्राकार मार्ग से गुजरती हैं. 
  • जिससे यह साबित होता है कि पृथ्वी के भीतर घनत्व में विभिन्नता है. 
  • घनत्व की विभिन्नता के कारण लहरें परावर्तित होकर वक्राकार हो जाती हैं. 
  • इस वजह से तरंगों का मार्ग भी वक्राकार हो जाता है. 
  • अतः कोर में ये लहरें, (P) और (S) वक्राकार होकर सतह की ओर अवतल हो जाती हैं. 
  • ‘एस’ लहरों का यह स्वभाव होता है कि वे तरल पदार्थ से होकर नहीं गुजरती हैं. 
  • अतः पृथ्वी के अन्तरतम में ‘एस’ तरंगों का पूर्ण अभाव है, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तरल अवस्था में क्रोड़ है जो कि 2900 किमी. से अधिक गहराई में केन्द्र के चारों और फैला है जिससे विद्वानों ने अनुमान लगाया कि पृथ्वी के अन्तरतम में लोहा और निकल तरल अवस्था में है.

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