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फिरोज शाह तुगलक की गृह-नीति Firuz Shah Tughlaq’s Domestic policy

फिरोज शाह तुगलक की गृह-नीति Firuz Shah Tughlaq‘s Domestic policyफिरोजशाह तुगलक की गृह-नीति न्याय व्यवस्था के क्षेत्र में फिरोजशाह तुगलक ने अंग-भंग आदि कठोर व अमानवीय दण्डों को समाप्त कर दिया तथा राज्य के सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर अदालतें स्थापित करने हेतु काजी तथा मुफ्ती नियुक्त किए.

 

फिरोज शाह तुगलक की गृह-नीति Firuz Shah Tughlaq's Domestic policy

 

राजस्व व्यवस्था के अन्तर्गत सुल्तान ने लगभग 24 कष्टदायक करों को समाप्त किया तथा केवल 4 कर खराज, खम्स, जजिया व जकात ही लिए गए.

जनता को सिंचाई की सुविधाएं देकर सुल्तान ने सिंचित कृषि के क्षेत्रों पर सिंचाई कर (1/10 कृषि) भी लिया. भूमिकर उपज का 1/5 से 1/2 भाग होता था.

सुल्तान ने सिंचाई की सुविधा हेतु पाँच बड़ी नहरों-

  1. यमुना से हिसार (150 मील लम्बी),
  2. सतलुज से घग्घर तक (96 मील लम्बी),
  3. सिरमौर से हाँसी तक,
  4. घग्घर से फिरोजाबाद तक तथा
  5. यमुना से फिरोजाबाद तक का निर्माण करवाया. 

कई कुएं भी खुदवाए तथा लगभग 1200 फलों के बाग लगवाए.

अपने निर्माण कार्य में सुल्तान ने लगभग 300 नए नगर बसाए तथा खिज्राबाद व मेरठ से अशोक के स्तम्भों को दिल्ली में स्थापित करवाया.

सुल्तान फिरोजशाह ने अपने सैनिकों के पदों को वंशानुगत बना दिया तथा उन्हें जागीर के रूप में वेतन देने आरम्भ किए. इनके हानिकारक परिणाम कालान्तर में सामने आए.

युद्ध की लूट का 4/5 भाग सेना में बांट दिया जाता था. सुल्तान ने रोजगार दफ्तर तथा ‘दीवान-ए-खैरात’ (दान विभाग) नामक विभाग की स्थापना की. उसके काल में दासों की संख्या 1,80,000 तक पहुंच गई थी.

धार्मिक क्षेत्र में फिरोज तुगलक को धर्मान्ध व असहिष्णु कहा गया है.

डा. आर.सी. मजूमदार ने तो यहाँ तक कहा है कि

‘‘फिरोज इस युग का सबसे धर्मान्ध एवं इस क्षेत्र में सिकन्दर लोदी एवं औरंगजेब का अग्रगामी था.”

साहित्य, शिक्षा और कला के क्षेत्र में फिरोज ने विशेष रुचि ली. उसने मकतबों तथा मदरसों की स्थापना की. ‘बरनी‘ तथा ‘शम्सी सिराज’ नामक इतिहासकारों को उसने संरक्षण दिया.

फिरोज ने अपनी जीवनी ‘फतूहाते-फिरोजशाही’ की रचना की. उसने लगभग 300 प्राचीन संस्कृत ग्रंथों को फारसी के प्रसिद्ध विद्वान आजउद्दीन खालिद द्वारा फारसी में अनुवादित करवाया जिसके संग्रह को ‘दलियाले-फिरोजशाही’ के नाम से जाना जाता है.

मुद्रा व्यवस्था के अन्तर्गत उसने बड़ी संख्या में तांबे और चांदी के सिक्के जारी करवाए, जिन्हें सम्भवतः ‘अद्धा’ एवं ‘बिख’ कहा जाता था.

प्रसिद्ध इतिहासकार वुल्जले हेग ने फिरोजशाह तुगलक के कला-प्रेम के विषय में लिखा है कि,

“उसे ऐसे निर्माण कार्य का शौक था कि उस दृष्टि से वह रोमन सम्राट् अगस्टस से यदि बढ़ा-चढ़ा नहीं तो कम-से-कम उसके समान अवश्य था.”

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