तुगलक काल में वास्तुकला (Architecture in the Tughlaq period)

तुगलक काल में वास्तुकला (Architecture in the Tughlaq period)तुगलक काल में सुल्तानों ने इमारतों की भव्यता व सुन्दरता के स्थान पर सादगी और विशालता पर अधिक बल दिया तथा मितव्ययिता की नीति अपनाई.

तुगलक काल में वास्तुकला (Architecture in the Tughlaq period)

 

इस काल की प्रमुख इमारतें निम्न हैं

तुगलकाबाद

  • इसका निर्माण गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के पास ऊंची पहाड़ियों पर करवाया था.
  • उसने इसमें एक दुर्ग (छप्पन कोट) का निर्माण भी करवाया.
  • नगर में प्रवेश के लिए 52 दरवाजे बनाए गए तथा यहाँ के सुन्दर राजमहल में जनाना खाना, तहखाना, बरामदा आदि का निर्माण करवाया गया.
  • इब्नबतूता के अनुसार ‘राजमहल सूर्य के प्रकाश में इतना चमकता था कि कोई भी व्यक्ति इसे टकी बाँध कर नहीं देख पाता था.
  • ‘ छप्पनकोट नामक दुर्ग की दीवारें मिस्त्र के पिरामिडों की तरह झुकी हुई थीं. इसकी नींव गहरी तथा दीवारें मोटी थीं.

सर जॉन मार्शल के अनुसार,

“इसकी सुदृढ़ व्यवस्था धोखा है, क्योंकि इसका निर्माण निम्न कोटि का है.”

गयासुद्दीन का मकबरा

  • यह मकबरा मिस्त्र के पिरामिडों की तरह 75° के कोण पर अन्दर की ओर झुका हुआ है.
  • इस मकबरे में ऊपर संगमरमर का गुम्बद बना है.
  • इसमें हिन्दू मन्दिरों की शैली के आधार पर आमलक और कलश का प्रयोग किया गया है.
  • इस मकबरे की ऊंचाई लगभग 81 फीट है.
  • यह मकबरा कुल मिला कर भव्य और सुन्दर है.

सर जॉन मार्शल के अनुसार,

“कुछ त्रुटियों के बावजूद यह मकबरा एक नवीन शैली की ओर संकेत करता है.”

आदिलाबाद का किला

जहाँपनाह नगर

  • इसका निर्माण मुहम्मद तुगलक ने सीरी और रायपिथौरा के मध्य में करवाया था.
  • सुल्तान एक ऐसे नगर की स्थापना करना चाहता था जो बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रहे तथा वहाँ की जनता को किसी प्रकार का कष्ट न हो.
  • इस नगर में 13 दरवाजे थे तथा इसके चारों तरफ 12 गज मोटी दीवार बनवाई गई थीं. इसके अवशेष आज खण्डहर के रूप में विद्यमान हैं.

बारहखम्भा

  • यह तुगलक कालीन धर्मनिरपेक्ष इमारतों में विशिष्ट है, जो आवास हेतु प्रयोग की जाती थी.
  • इसकी महत्वपूर्ण विशेषता सुरक्षा एवं गुप्त निवास है.

कुश्क-ए-फिरोजाबाद

  • फिरोज तुगलक द्वारा निर्मित इस भवन में विशाल दीवारें तथा सुदृढ़ स्तम्भ थे.
  • इसके निकट ही तीन जलाशय थे.
  • इसके प्राप्त भग्नावशेषों में एक जामा मस्जिद के भी अवशेष मिले हैं, जिसे लगभग 1354 ई. में बनवाया गया था.
  • कुश्क-ए-फिरोजाबाद वास्तव में धार्मिक कार्यों के उद्देश्य से निर्मित भवनों का समूह था.

कुश्क-ए-शिकार

  • फिरोज तुगलक द्वारा निर्मित यह भवन शिकार (आखेट) से ही सम्बन्धित था तथा सुल्तान इसे ‘शाहनुमा’ कह कर पुकारता था.
  • इसके सामने मेरठ से लाया गया स्तम्भ गड़वाया गया था.

फिरोजशाह कोटला

  • फिरोज तुगलक ने दिल्ली में शाहजहाँबाद से दुगुने क्षेत्रफल के फिरोजशाह दुर्ग का निर्माण करवाया.
  • इसकी चार दीवारी के अन्दर अनेक भवनों का निर्माण करवाया गया.
  • प्रवेश हेतु द्वार पश्चिम में बना है.
  • अम्बाला के टोपरा गाँव से अशोक का स्तम्भ उठा कर इस दुर्ग में स्थापित करवाया गया.
  • इस दुर्ग में स्थित जामा मस्जिद इतनी विशाल थी कि 10,000 व्यक्ति एक साथ इसमें नमाज अदा कर सकते थे.
  • इसमें कुछ अन्य इमारतें-बेगम पुरी मस्जिद, काली मस्जिद, दरगाह-ए-शाह आलम, जहाँपनाह नगर में खिड़की मस्जिद आदि प्रसिद्ध थीं.
  • दुर्ग के अन्दर एक दो मंजिली इमारत के अवशेष मिले हैं जो सम्भवतः विद्यालय के रूप में प्रयोग होती थी.

फिरोजशाह का मकबरा

  • संगमरमर और लाल पत्थर से निर्मित इस वर्गाकार इमारत का गुम्बद अष्टकोणीय ड्रम पर निर्मित है.
  • इसकी मजबूत दीवारों को फूल पत्तियों एवं बेल-बूटों से सजाया गया था.

खिड़की मस्जिद

  • जहाँपनाह नगर में तहखाने के ऊपर वर्गाकार रूप में निर्मित यह मस्जिद दुर्ग की तरह दिखती है.
  • इसकी तुलना इल्तुतमिश के सुल्तान घड़ी से भी की जाती है.

खान-ए-जहाँ तेलंगानी का मकबरा

  • लाल पत्थर एवं सफेद संगमरमर का अष्टभुजाकार यह मकबरा खाने जहाँ जूनाशाह ने अपने पिता खाने जहाँ तेलंगानी (फिरोजशाह तुगलक की प्रधानमन्त्री) की स्मृति में बनवाया था.
  • इसकी तुलना जेरुसलम में निर्मित उमर की मस्जिद से की जाती है.

काली मस्जिद

  • फिरोज तुगलक के शासन काल में जीनाशाह द्वारा निर्मित इस दो मंजिली मस्जिद में अर्द्धवृत्तीय मेहराबों का प्रयोग किया गया है.
  • इसका विशाल आंगन है, जो चार भागों में बंटा हुआ है.

कलां मस्जिद

  • शाहजहाँबाद में तहखाने के ऊपर निर्मित इस मस्जिद को खाने जीनाशाह ने बनवाया था.
  • इसकी छत पर गुम्बद तथा चारों कोनों पर बुर्ज बने हुए हैं.

बेगमपुरी मस्जिद

  • यह जहाँपनाह नगर में स्थित है.
  • इसके निर्माण में संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है.
  • इसके गुम्बद और मेहराब प्रभावशाली हैं.

कबिरुद्दीन औलिया का मकबरा

  • इसे ‘लाल गुम्बद’ के नाम से भी जाना जाता है जिसे गयासुद्दीन द्वितीय (1388-89 ई.) के काल में बनवाया गया था.
  • किन्तु इसका निर्माण कार्य नासिरुद्दीन मुहम्मद के काल में 1392 ई. में पूर्ण हुआ.
  • यह एक आयताकार इमारत है जिसमें लाल पत्थर व संगमरमर का सुन्दर सम्मिश्रण देखने को मिलता है.
  • यह तुगलक कालीन इमारतों से भिन्न है तथा इसमें खिलजी कालीन अलंकरण देखने को मिलते हैं.

 

तुगलक काल में वास्तुकला (Architecture in the Tughlaq period)

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